रायपुर, नवंबर 21 -- हिंदी साहित्य जगत का प्रतिष्ठित सम्मान 'ज्ञानपीठ पुरस्कार' शुक्रवार को महान साहित्यकार विनोद कुमार शुक्ल को उनके रायपुर स्थित आवास पर ही प्रदान किया गया। राज्य के मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने इस अवसर पर उन्हें बधाई दी है।
साहित्य जगत में यह दृश्य अपने आप में अनूठा रहा-क्योंकि विनोद जी के स्वास्थ्य कारणों से वे किसी औपचारिक समारोह में उपस्थित नहीं हो सकते थे। इसलिए ज्ञानपीठ प्रतिनिधिमंडल स्वयं उनके घर पहुंचा और वाग्देवी की प्रतिमा व पुरस्कार राशि का चेक सौंपकर उन्हें सम्मानित किया।
सम्मान ग्रहण करते हुए श्री शुक्ल ने संक्षिप्त लेकिन गहरे शब्दों में कहा कि आज जब भाषाओं के भविष्य को लेकर चिंता व्यक्त की जाती है, उन्हें पूरी उम्मीद है कि नई पीढ़ी हर भाषा, हर विचार और हर परंपरा का सम्मान करना सीखेगी। उनके मुताबिक "किसी भाषा या अच्छे विचार का खत्म होना, मनुष्यता का खत्म होना है।" उन्होंने पुरस्कृत होकर भी विनम्रता से कहा कि"उम्मीद ही जीवन की सबसे बड़ी ताकत है. लिखना और पढ़ना मेरे लिए सांस लेने जैसा है।"मुख्यमंत्री साय ने अपने बधाई संदेश में कहा कि विनोद कुमार शुक्ल हिंदी साहित्य की उस विराट परंपरा के प्रतिनिधि हैं, जिसने अपनी सादगी, संवेदना और अद्भुत लेखन-शक्ति से साहित्य की दुनिया में एक विशिष्ट स्थान बनाया है। उनकी लेखनी ने न केवल हिंदी भाषा को समृद्ध किया है, बल्कि पाठकों की अनेक पीढ़ियों को गहराई से प्रभावित किया है।
मुख्यमंत्री ने कहा कि यह हम सभी प्रदेशवासियों के लिए गर्व का क्षण है कि विनोद कुमार शुक्ल को यह सर्वोच्च साहित्यिक सम्मान प्रदान किया गया। उन्होंने कहा कि यह सम्मान साहित्य जगत में उनके अद्वितीय योगदान को प्रदर्शित करता है।
एक जनवरी 1937 को राजनांदगांव में जन्मे विनोद कुमार शुक्ल पिछले पाँच दशकों से भी अधिक समय से निरंतर लेखन में सक्रिय हैं। ग्रामीण परिवेश, मानवीय संवेदना, सूक्ष्म अनुभूतियों और गहन कल्पना-ये सभी तत्व उनकी रचनाओं को विशिष्ट बनाते हैं।
उनकी पहली कविता संग्रह 'लगभग जय हिंद' 1971 में प्रकाशित हुई और यहीं से हिंदी साहित्य में उनकी विशिष्ट पहचान बनी। बाद में आए संग्रह आकाश धरती को खटखटाता है, कविता से लंबी कविता, वह आदमी चला गया नया गरम कोट पहनकर जैसी रचनाओं ने उन्हें आधुनिक हिंदी साहित्य के प्रमुख कवियों की श्रेणी में स्थापित किया।
उनकी कहानी संग्रह पेड़ पर कमरा, महाविद्यालय और बच्चों के लिए लिखी रचनाएँ हरे पत्ते के रंग की पतरंगी, कहीं खो गया नाम का लड़का पाठकों में बेहद लोकप्रिय रहीं। हिंदी के श्रेष्ठ उपन्यासों की बात हो तो उनका नाम अवश्य लिया जाता है- नौकर की कमीज, खिलेगा तो देखेंगे, दीवार में एक खिड़की रहती थीविनोद कुमार शुक्ल को समय-समय पर अनेक प्रतिष्ठित सम्मान मिल चुके हैं-साहित्य अकादमी पुरस्कार (1999, दीवार में एक खिड़की रहती थी) , गजानन माधव मुक्तिबोध फेलोशिप,रजा पुरस्कार,दयावती मोदी कवि शिखर सम्मान , भवानी प्रसाद मिश्र पुरस्कार, मातृभूमि बुक ऑफ द ईयर, अंतरराष्ट्रीय 'नाबोकोव अवॉर्ड' पाने वाले वह पहले एशियाई लेखक हैं। उनकी रचनाओं के दुनिया की कई भाषाओं में अनुवाद हुए हैं।
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