नैनीताल , फरवरी 19 -- उत्तराखंड की चीन सीमा से सटे नीलोंग घाटी में कथित रूप से ग्रामीणों की भूमि को बिना अधिग्रहण प्रक्रिया के सेना द्वारा अपनाये जाने के मामले में उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने गुरुवार को केन्द्रीय रक्षा और गृह मंत्रालय के साथ ही प्रदेश के गृह और सचिव वन तथा जनजातीय कल्याण निदेशालय से जवाब तलब किया है।
उत्तरकाशी की जढ़ भोटिया जनकल्याण समिति की ओर से इस मामले को चुनौती दी गई है। इस प्रकरण पर न्यायमूर्ति पंकज पुरोहित की खंडपीठ में सुनवाई हुई।
याचिकाकर्ता की ओर से कहा गया कि वर्ष 1962 में भारत-चीन युद्ध के बाद भारतीय सेना ने नीलोंग घाटी को अपने नियंत्रण ले लिया और यहां प्रवेश प्रतिबंधित कर दिया। यही नहींवर्ष 1990 में भारत सरकार ने नीलोंग गांव की 278 नाली भूमिधरी और 18 नाली सरकारी भूमि के हस्तांतरण की मंजूरी दे दी लेकिन अधिग्रहण प्रक्रिया पूरी नहीं हो पायी।
इसके बाद सेना ने गांव की भूमिधरी और सरकारी भूमि पर कब्जा कर लिया। इसके बदले में ग्रामीणों को मुआवजा भी नहीं दिया गया।
इस मामले में वर्ष 2014 से 2019 तक भारत सरकार के साथ ही राज्य सरकार को कई प्रत्यावेदन दिये गये लेकिन कोई कार्रवाई नहीं हुई। वर्ष 2019 में ग्रामीणों की ओर से जड़ भोटिया जनकल्याण समिति का गठन किया गया।
इसके पश्चात् उत्तरकाशी के जिलाधिकारी की ओर से 2020 में ग्रामीणों के पुनर्वास से संबंधित मुद्दे को सुलझाने के लिए 13 सदस्यीय समिति का गठन किया गया जिसमें सेना और सशस्त्र बलों को भी शामिल किया गया।
समिति की संयुक्त सर्वेक्षण रिपोर्ट में पुष्टि हुई कि घाटी के नेलोंग गांव की 6.173 हेक्टेयर भूमिधरी जमीन पर सेना का कब्जा है और उसमें भवन और हेलीपैड बने हैं। साथ ही जादुंग गांव की 2.807 हेक्टेयर भूमि पर भारत तिब्बत सीमा पुलिस (आईटीबीपी), सेना और वन विभाग काबिज है।
यह भी कहा गया कि वर्ष 2024 में सरकार की ओर से कहा गया कि जादुंग गांव को सरकार बाइव्रेंट विलेज के रूप में विकसित करेगी और यहां चरणबद्ध तरीके से 23 होमस्टे विकसित किए जाएंगे।
याचिकाकर्ता की ओर से मांग की गयी कि उन्हें भी बाइव्रेंट विलेज योजना का लाभ मिले और उनका विकास के साथ पुनर्वास किया जाए।
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