नयी दिल्ली , फरवरी 12 -- दिल्ली विश्वविद्यालय के इतिहास विभाग की वरिष्ठ प्रोफेसर प्रोफेसर चारु गुप्ता को प्रतिष्ठित 'आनंद केंटिश कुमारस्वामी पुस्तक पुरस्कार' (दक्षिण एशिया) से सम्मानित किया गया है। इस सम्मान के साथ उन्हें एक हजार डॉलर (करीब 91 हजार रुपये) भी मिलेंगे।
प्रोफेसर गुप्ता को यह पुरस्कार उनकी नयी पुस्तक 'हिंदी हिंदू हिस्ट्रीज: कॉस्ट, आयुर्वेद, ट्रेवल एंड कम्युनिज्म इन अर्ली ट्वेटिन्थ सेंचुरी इंडिया' के लिए 'एसोसिएशन फॉर एशियन स्टडीज (एएएस) ने दिया है।
आनंद केंटिश कुमारस्वामी पुरस्कार दक्षिण एशिया पर विशिष्ट और मौलिक विद्वतापूर्ण कार्यों के लिए दिया जाता है। कला इतिहासकार और सांस्कृतिक चिंतक आनंद के कुमारस्वामी के नाम पर स्थापित यह पुरस्कार उन पुस्तकों को दिया जाता है, जो दक्षिण एशिया के इतिहास, संस्कृति और समाज के अध्ययन में महत्वपूर्ण और स्थायी योगदान देता हैं। इसे दक्षिण एशियाई अध्ययन के क्षेत्र में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सम्मानित मान्यता है।
यह पुस्तक 20वीं सदी की शुरुआत में उत्तर भारत की उत्तर भारत में आत्मकथाओं और 'प्रिंट' संस्कृति के जरिये हिंदू जीवन के विभिन्न पहलुओं की पड़ताल करती है। इसमें जाति, आयुर्वेद, यात्रा वृत्तांत और साम्यवाद का ऐतिहासिक विश्लेषण किया गया है। यह दिखाती है कि उस परिवर्तनकारी दौर में जाति, लिंग, राष्ट्र और हिंदू पहचान को लेकर विभिन्न लोकभाषायी दृष्टियां किस तरह से उभर रही थीं।
चारु गुप्ता की अन्य चर्चित पुस्तकों में 'सेक्सुअलिटी, ऑब्सिनिटी, कम्युनिटी एंड द जेंडर ऑफ कॉस्ट तथा 'जाति और लिंग: दलित, सवर्ण और हिंदी प्रिंट संस्कृति' हैं।
एएएस इस वर्ष की पुरस्कार प्रतियोगिताओं के विजेताओं की घोषणा करते हुए कहा कि सभी सम्मानित व्यक्तियों को बधाई। यह समारोह शुक्रवार 13 मार्च को वैंकुवर कन्वेंशन सेंटर के बॉलरूम सी में एएएस अध्यक्ष नैन्सी पेलुसो के संबोधन के तुरंत बाद शुरू होगा।
चारु गुप्ता के अलावा एएएस इस वर्ष एशिया के विभिन्न क्षेत्रों पर किये गये शोध कार्यों के लिए इन्हें भी अलग-अलग श्रेणी में पुरस्कार दे रहा है।
दक्षिण एशिया क्षेत्र के लिए बर्नार्ड एस कोहन पुरस्कार रिषद चौधरी को उनकी पुस्तक 'हज एक्रॉस एम्पायर' और संदीप्तो दासगुप्ता को उनकी कृति 'लीगलाइजेशन द रिवॉल्यूशन' के लिए संयुक्त रूप से दिया गया है।
एके रामानुजन अनुवाद पुरस्कार शिप्रा मुखर्जी और मृण्मय प्रमाणिक को कल्याणी ठाकुर चराल की मूल रचना 'आई बिलॉन्ग टू नोह्वेयर' के बेहतरीन अनुवाद के लिए सम्मानित किया गया है।
वहीं चीन और आंतरिक एशिया क्षेत्र के लिए जोसेफ लेवेन्सन पुरस्कार जोहान एल्वर्सकोग को 'ए हिस्ट्री ऑफ उग्यूर बुद्धिज्म' और चुआन-फंग वोंग को 'इवेन इन द रेन' पुस्तक में अपने गहन शोध कार्यों के लिए मिला है।
दक्षिण-पूर्व एशिया क्षेत्र के शोध कार्यों के लिए हैरी जे बेंडा पुरस्कार जोशुआ बार्कर को उनकी पुस्तक 'स्टेट फॉर फीयर' और एडम बोबेट को 'द पल्स ऑफ द अर्थ' के लिए दिया गया है, जबकि जॉर्ज मैकटी काहिन पुरस्कार इतिहासकार क्रिस्टोफर गोशा को उनकी प्रभावशाली पुस्तक 'द रोड टू दाइन बीइन फू' के लिए चुना गया है।
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