बड़वानी/खरगोन , मार्च 1 -- पश्चिमी मध्य प्रदेश के भील, भिलाला और बारेला आदिवासी समुदायों में चांदी केवल धातु नहीं, बल्कि पहचान, परंपरा और सामाजिक प्रतिष्ठा का प्रतीक रही है। पीढ़ियों से इन समुदायों ने सोने की बजाय चांदी को प्राथमिकता दी है, लेकिन इस वर्ष चांदी की कीमतों में आई तेज बढ़ोतरी ने भगोरिया जैसे पारंपरिक त्योहार की रौनक को प्रभावित किया है।

स्थानीय स्वर्णकार स्वप्निल सोनी, जिनका परिवार करीब सात दशक से आदिवासी ग्राहकों से जुड़ा है, बताते हैं कि इस सीजन में चांदी के गहनों की मांग में भारी गिरावट आई है। उनके अनुसार पिछले वर्ष तिवारिया बाजारों के दौरान क्षेत्र में लगभग पांच क्विंटल चांदी के गहने बिके थे, जबकि इस बार बिक्री एक क्विंटल से भी कम रही है। भगोरिया हाट में पूछताछ भी सीमित रही।

तिवारिया बाजार, जो भगोरिया से लगभग एक सप्ताह पहले लगते हैं, आदिवासी समाज के लिए विशेष महत्व रखते हैं। यहां पारंपरिक गहने, कपड़े, बर्तन और अन्य आवश्यक वस्तुएं खरीदी जाती हैं। इस बार बाजारों में पूर्व वर्षों जैसा उत्साह नजर नहीं आया।

सेंधवा और राजपुर के स्वर्णकारों के अनुसार परंपरागत रूप से आदिवासी परिवार त्योहारों और शादियों में सिर से पांव तक 31 प्रकार के चांदी के गहने पहनते हैं। महिलाएं भगोरिया, इंदल, दिवाली और होली जैसे अवसरों पर पांच से आठ किलोग्राम तक वजनी गहनों से स्वयं को सजाती हैं। ये गहने सौंदर्य के साथ समृद्धि और सांस्कृतिक निरंतरता का प्रतीक भी माने जाते हैं।

बारेला समुदाय में चांदी का धार्मिक महत्व भी विशेष है। कुल देवी देवमोगरा देवी को चांदी के गहने और वस्त्र अर्पित किए जाते हैं। आदिवासी मामलों के जानकारों के अनुसार ऐतिहासिक रूप से चांदी अपेक्षाकृत सस्ती और सुरक्षित मानी जाती रही है। वन क्षेत्रों में रहने वाले समुदायों के लिए सोना महंगा और जोखिमपूर्ण विकल्प रहा, जबकि चांदी टिकाऊ और व्यवहारिक रही।

सगाई की रस्म जोड़ावनी में दुल्हन को एक से पांच किलोग्राम तक चांदी उपहार में देने की परंपरा है। सामान्यतः महिलाएं केवल नाक की सोने की अंगूठी पहनती हैं, जबकि अन्य सभी आभूषण चांदी के होते हैं। प्रचलित गहनों में मोटी पायल, बाजूबंद, कमरबंद, सिक्कों का हार, तगली और पटली शामिल हैं। पुरुष भी चांदी के कड़े पहनते हैं। आर्थिक रूप से कमजोर परिवार जर्मन सिल्वर जैसे विकल्प अपनाते हैं।

समाजशास्त्रियों का मानना है कि चांदी पहनना पुरानी सांस्कृतिक परंपरा है। सोना बड़ी मात्रा में रखना महंगा और असुरक्षित माना जाता रहा है, जबकि चांदी जीवन की व्यावहारिक जरूरतों से जुड़ी रही है।

हालांकि अब चांदी की कीमतें करीब ढाई लाख रुपये प्रति किलोग्राम तक पहुंचने से सामाजिक और आर्थिक चुनौतियां बढ़ी हैं। जनप्रतिनिधियों ने भी इस विषय को उठाते हुए कहा है कि विवाह में दुल्हन को दो से तीन किलो चांदी देना सामाजिक परंपरा है, लेकिन बढ़ती कीमतों के कारण कई परिवारों के लिए यह कठिन होता जा रहा है।

जहां पहले चांदी आर्थिक सुरक्षा का माध्यम मानी जाती थी, वहीं अब वही परंपरा कई परिवारों पर आर्थिक दबाव बनती दिख रही है। इसके बावजूद आदिवासी समाज में चांदी का सांस्कृतिक और भावनात्मक महत्व आज भी बरकरार है।

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