नयी दिल्ली , अक्टूबर 28 -- देश के आर्थिक उत्पाद की वृद्धि का प्रमुख आधार बन चुके सेवा क्षेत्र ने 2024-25 में राष्ट्रीय सकल मूल्य संवर्धन (जीवीए) में लगभग 55 प्रतिशत का योगदान दिया है और अब धीरे धीरे अपेक्षाकृत पिछड़े राज्यों में सेवा कारोबार का विस्तार दिखने लगा है।
यह जानकारी नीति आयोग की ताजा रिपोर्ट "भारत का सेवा क्षेत्र: रोजगार रूझानों और राज्य-स्तरीय सक्रियता पर अंतर्दृष्टि" में दी गयी है ।
रिपोर्ट में सेवा कार्यबल का बहुआयामी विवरण प्रस्तुत किया गया है जो इस क्षेत्र के दोहरे चरित्र को उजागर करती है । सेवा क्षेत्र में एक तरफ आधुनिक, उच्च-उत्पादकता वाले सेवा कारोबार है जो वैश्विक रूप से प्रतिस्पर्धी तो हैं, लेकिन इनमें रोजगार सृजन की क्षमताएं सीमित हैं। दूसरी ओर पारंपरिक सेवा क्षेत्र हैं जो बड़ी संख्या में श्रमिकों को अपने में समाहित करते हैं लेकिन ऐसी सेवाएं मुख्यतः अनौपचारिक और कम वेतन वाले कारोबार के रूप में बनी हुई हैं। सेवाओं के क्षेत्र में रोजगार की गुणवत्ता में सुधार उत्पादन वृद्धि से पीछे चल रहा है।
नीति आयोग के सीईओ बी.वी.आर. सुब्रह्मण्यम द्वारा यहां जारी यह रिपोर्ट उत्पादन और रोजगार के व्यापक दृष्टिकोण से सेवा क्षेत्र का पहला समर्पित मूल्यांकन हैं जो समग्र रुझानों से आगे बढ़कर अलग-अलग और राज्य-स्तरीय रूपरेखा प्रस्तुत करती हैं। इस अवसर पर आयोग के सदस्य डॉ. अरविंद विरमानी और सरकार के मुख्य आर्थिक सलाहकार डॉ. वी. अनंत नागेश्वरन केंद्र और राज्य सरकारों के वरिष्ठ अधिकारी, उद्योग संघों के प्रतिनिधि और शिक्षा जगत के सदस्य उपस्थित थे।
रिपोर्ट में पाया गया है कि सेवा-आधारित विकास का प्रसार अब क्षेत्रीय रूप से अधिक संतुलित होता जा रहा है। इसके अनुसार सेवा क्षेत्र में अंतर-राज्यीय असमानताएं हल्की बढ़ी हैं, लेकिन इस बात के स्पष्ट प्रमाण भी हैं कि पिछड़े राज्य भी सेवा क्षेत्र के विस्तार में शामिल होने लगे हैं। रिपोर्ट में कहा गया है कि देश का सेवा-आधारित परिवर्तन धीरे-धीरे अधिक व्यापक और स्थानिक रूप से समावेशी होता जा रहा है।
रिपोर्ट में क्षेत्रीय असमानताओं के समाधान के लिए विविधीकरण और प्रतिस्पर्धात्मकता में तेजी लाने के लिए डिजिटल बुनियादी ढांचे, लॉजिस्टिक, नवाचार, वित्त और कौशल विकास को प्राथमिकता देने की सिफ़ारिश की गयी है। इसमें राज्य स्तर पर, स्थानीय क्षमताओं के आधार पर सेवाओं के कारोबार को प्रोत्साहित करने के लिए अनुकूलित रणनीतियां विकसित करने, संस्थागत क्षमता में सुधार करने, सेवाओं को औद्योगिक प्रणालियों के साथ एकीकृत करने और शहरी एवं क्षेत्रीय सेवा समूहों का विस्तार करने की सिफ़ारिश की गयी है।
आयोग की ओर से मंगलवार को जारी एक विज्ञप्ति के अुनसार यह रिपोर्ट दर्शाती है कि सेवायें भारत में रोजगार वृद्धि और महामारी के बाद की स्थिति में सुधार का मुख्य आधार बनी हुई हैं ,फिर भी इनमें चुनौतियां कायम हैं। विभिन्न सेवा उप-क्षेत्रों में रोजगार सृजन की दशाएं असमान है, सेवा क्षेत्र में कारोबार अब भी व्यापक रूप से अनौपचारिक या अपंजीकृत तरीके का है जिसके कारण रोजगार की गुणवत्ता उत्पादन वृद्धि से पीछे है।
रिपोर्ट में सेवा क्षेत्र में रोजगार अवसरों में लैंगिक असमानता, ग्रामीण-शहरी अंतर और क्षेत्रीय असमानताओं के मद्देनजर एक ऐसी रोजगार रणनीति की आवश्यकता को रेखांकित किया गया है जो कारोबार को औपचारिकता रूप देने, समावेशन और उत्पादकता बढ़ाने वाला हो।
रिपोर्ट में चार-भागों में एक नीतिगत रोडमैप प्रस्तुत किया गया है जिसमें गिग, स्व-रोजगार और लघु और मझोले क्षेत्र के श्रमिकों के पंजीकरण और सामाजिक सुरक्षा, महिलाओं और ग्रामीण युवाओं के लिए अवसरों का विस्तार करने के लिए लक्षित कौशल और डिजिटल पहुंच, उभरती और हरित अर्थव्यवस्था कौशल में निवेश और टियर-2 व टियर-3 शहरों में सेवा केंद्रों के माध्यम से संतुलित क्षेत्रीय विकास पर ध्यान केंद्रित किये जाने की योजनाएं अपनाने की सिफारिश की गयी है।
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