पटना , फरवरी 05 -- स्वच्छ भारत मिशन (ग्रामीण) तथा लोहिया स्वच्छ बिहार अभियान के अंतर्गत ग्रामीण क्षेत्रों में ठोस एवं तरल अपशिष्ट का प्रबंधन किया जा रहा है। पर्यावरण के लिए गंभीर चुनौती बन चुके प्लास्टिक की समस्या से निपटने के लिए स्वच्छ भारत मिशन (ग्रामीण / लोहिया स्वच्छ बिहार अभियान के अंतर्गत ग्रामीण क्षेत्रों प्लास्टिक अपशिष्ट के प्रबंधन का कार्य किया जा रहा हैं, जिसके साकारात्मक परिणाम सामने आये हैं।

राज्य सलाहकार ठोस एवं तरल अपशिष्ट प्रबंधन प्लास्टिक के रतनीश वर्मा ने बताया कि अब तक राज्य भर में स्थापित 171 प्लास्टिक अपशिष्ट प्रबंधन इकाइयों पर आठ लाख 20 हजार किलोग्राम प्लास्टिक अपशिष्ट का संग्रहण किया गया है, जिनमें करीब आठ लाख 10 हजार किलोग्राम को प्रसंस्कृत कर रिसायकलर को बेचा गया है।

इसके तहत ग्रामीण क्षेत्रों में ठोस एवं तरल अपशिष्ट का प्रबंधन किया जा रहा है। प्लास्टिक अपशिष्ट प्रबंधन इस मुहिम का एक प्रमुख घटक है। प्लास्टिक कचरे के निपटारे के लिए प्रखंड / अनुमंडल स्तर पर प्लास्टिक अपशिष्ट प्रबंधन इकाई का निर्माण प्रावधानित है। वर्तमान में राज्य में 171 प्लास्टिक अपशिष्ट प्रबंधन केन्द्र (पीडब्ल्यूएमयू) संचालित हैं, जिसके द्वारा सभी 533 प्रखंड को संबद्ध कर प्लास्टिक अपशिष्ट के प्रबंधन का कार्य किया जा रहा है।

इस मुहिम के तहत ग्राम पंचायतों में घर-घर से कचरे के उठाव हो रहा है। सफाई कार्य किया जा रहा है। इस दौरान एकत्र प्लास्टिक को ग्राम पंचायत स्तर पर बने अपशिष्ट प्रसंस्करण इकाई पर संग्रहित किया जहां जाता है। यहीं से विभिन्न श्रेणी में प्लास्टिक की छंटाई कर निकटवर्ती प्लास्टिक अपशिष्ट प्रबंधन इकाई पर लाया जाता है। पीडब्ल्यूएमयू पर स्थानीय कबाड़ी एवं फेरीवालों से भी प्लास्टिक कचरा खरीदी जाती है एवं नगरीय निकायों से भी प्लास्टिक आती है। यहां एकत्रित प्लास्टिक अपशिष्ट को विशिष्टता के आधार पर विभिन्न श्रेणियों ,सिंगल यूज प्लास्टिक, मल्टी-लेयर प्लास्टिक, पेट बॉटल, लो डेन्सिटी प्लास्टिक, हाई डेन्सिटी प्लास्टिक, पीवीसी इत्यादि में पृथक किया जाता है।

प्लास्टिक अपशिष्ट प्रबंधन इकाई तीन तरह की मशीन फटका मशीन, श्रेडर एवं कंप्रेशर मशीन लगायी गयीं हैं।

फटका मशीन से प्लास्टिक कचरे की धूल हटाई जाती है। इसके बाद बेलिंग मशीन से प्लास्टिक कचरे को अत्यधिक दबाव देकर कम्प्रेस किया जाता है और बंडल बनायी जाती है। तीसरी श्रेडिंग मशीन होती है, जिसके द्वारा हार्ड प्लास्टिक को श्रेडिंग मशीन से छोटे-छोटे टुकड़ों में काट लिया जाता है।

प्लास्टिक के कंप्रेस्ड बंडल या छोटे-छोटे टुकड़ों को बोरों में भरकर पुनर्चक्रण करने वाले प्लास्टिक उत्पादन इकाइयों को बेचा जाता है, जिससे प्लास्टिक अपशिष्ट प्रबंधन इकाई को आमदनी होती है। इस पहल से प्लास्टिक अपशिष्ट की समस्या दूर हो रही है साथ ही इससे आय और रोजगार के अवसर भी सृजित हो रहे हैं।

इस मुहिम में सुपौल जिला प्लास्टिक अपशिष्ट प्रबंधन की सफलता की नई राह दिखा रहा है। जिला के पांच प्रखंड क्रमश: बसंतपुर, छातापुर, किशनपुर, पिपरा एवं सुपौल में स्वच्छ भारत (मिशन) / ग्रामीण लोहिया स्वच्छ बिहार अभियान अंतर्गत प्लास्टिक अपशिष्ट प्रबंधन इकाई (पीडब्ल्यूएमयू) की स्थापना की गयी है। प्रति इकाई की स्थापना में करीब 16 लाख रुपये की लागत आई। इन सभी इकाइयों में धूल हटाने वाली फटका मशीन, कतरन मशीन एवं बेलिंग मशीन लगी हैं। यहां आसपास के ग्राम पंचायतों एवं स्थानीय निजी कबाड़ीवालों से प्लास्टिक कचरा प्राप्त कर उसे कंप्रेस एवं कतरन कर रिसाइकल एजेंसियों को बेचा जाता है।

जिला सलाहकार क्षमतावर्धन एवं सूचना शिक्षा एवं संचार सुभाष कुमार ने बताया कि सुपौल में अब तक 56000 किलो से अधिक प्लास्टिक कचरे का भंडारण किया गया है, जिसमें से 42000 किलो को प्रसंस्कृत किया गया है एवं बिक्री की गयी है, जिससे 2.10 रुपये से अधिक की आय हुई है।

जिला प्रशासन के सहयोग से सुपौल में एक उद्यमी द्वारा 'इंडिया ट्रेडर्स प्लास्टिक दाना निर्माण' इकाई की स्थापना की गयी है, जिसका संचालन 2025 से हो रहा है। इसके संचालक वीरेन्द्र कुमार ने बताया कि अभी तक इस संयंत्र पर करीब चार टन प्लास्टिक अपशिष्ट से दाना निर्माण हुआ है।

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