गांधीनगर , नवंबर 07 -- राष्टीय गीत वंदे मातरम् के 150 वर्ष पूरे होने के अवसर पर शुक्रवार को विधानसभा परिसर, गांधीनगर में आयोजित समारोह में वंदे मातरम् गीत का सामूहिक गान और स्वदेशी अपनाने के संकल्प की शपथ ली गयी। इस मौके पर मुख्यमंत्री भूपेंद्र पटेल भी मौजूद थे।

इस शपथ में स्वदेशी को दैनिक जीवन का एक हिस्सा बनाने और स्वदेशी वस्तुओं को दैनिक जीवन में अपनाने का आह्वान किया गया है। वंदे मातरम् राष्ट्रीय गीत के 150 वर्ष पूरे होने के इस गौरवशाली अवसर का उत्सव राज्य के जिला मुख्यालयों, नगरों और गांवों में मंत्रियों एवं पदाधिकारियों की उपस्थिति में जनभागीदारी के साथ आज मनाया गया।

श्री पटेल ने इस अवसर पर वंदे मातरम् गीत की महत्ता पर प्रकाश डालते हुए कहा कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने वंदे मातरम् गीत को विकास का राजमार्ग, संकल्पित राष्ट्र जीवन का महामार्ग और हमारी आजादी की धड़कन करार दिया है। 1875 में लिखित हमारे वंदे मातरम् गीत के सात नवंबर को 150 वर्ष पूरे होने के अवसर पर उनके मार्गदर्शन में राष्ट्रव्यापी उत्सव मनाया जा रहा है। इस उत्सव से 140 करोड़ भारतवासियों में 'राष्ट प्रथम' का भाव उजागर हुआ है। इस अवसर पर विधानसभा अध्यक्ष शंकरभाई चौधरी एवं राज्य मंत्री कांतिभाई अमृतिया उपस्थित रहे।

मुख्यमंत्री ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी, वंदे मातरम् गीत के शब्दों 'त्वम हि प्राणा शरीरे' को चरितार्थ करते हुए प्रत्येक सांस के साथ मां भारती के लिए समर्पित रहकर एक आदर्श जीवन जीने का उदाहरण समग्र देशवासियों को दे रहे हैं। उन्होंने वंदे मातरम् को भारत की आन, बान और शान बताया है।

उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री ने वंदे मातरम् गीत में की गयी मां भारती की कल्पना के अनुरूप सुजलाम-सुफलाम के साथ-साथ प्रत्येक बात को साकार करने के लिए सारे कदम उठाये हैं। गुजरात में उनके द्वारा शुरू की गयी पंचामृत शक्ति, कन्या केलवणी (शिक्षा), गरीबों-वंचितों के कल्याण के कदम या सबके विकास और सुख-समृद्धि की भावना भी वंदे मातरम में निहित है।

श्री पटेल ने कहा कि यह गीत बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय के उपन्यास 'आनंद मठ' में पहली बार प्रकाशित हुआ था और पहली बार जब रवीन्द्रनाथ टैगोर ने यह गीत गाया, तो देश के नागरिकों को एक अद्भुत रोमांच का अनुभव हुआ था। 'वंदे मातरम्' केवल एक गीत नहीं है, यह तो भारत की आत्मा का नाद और प्रत्येक भारतीय के हृदय में अनंत ऊर्जा, श्रद्धा और संकल्प जगाने वाले राष्ट्रप्रेम की पवित्र ध्वनि है।

मुख्यमंत्री ने कहा कि वंदे मातरम् एक ऐसा क्रांति मंत्र है, जिसे बोलते ही सभी भारतीयों के हृदय के तार झंकृत हो उठते हैं और मातृभूमि के प्रति वंदन का भाव समर्पण में परिवर्तित हो जाता है। वंदे मातरम् न केवल राष्ट्रीय गीत है, बल्कि यह प्रेरणा गीत भी है, जिसने स्वाधीनता संग्राम से लेकर आज तक सभी के हृदय में एक अनूठा स्थान बनाया है।

उन्होंने वंदे मातरम् गीत की रचना से संबंधित एक किस्से का उल्लेख करते हुए कहा कि वंदे मातरम् के रचयिता बंकिम चंद्र की छोटी पुत्री ने उनसे पूछा कि आप जिस मातृभूमि की स्तुति करते हैं, वह कैसी हैं, इस बारे में बताइए। तब इसके जवाब में उन्होंने वंदे मातरम गीत की रचना की और कहा कि यह भारत भूमि हरी- भरी, उपजाऊ, सभी को पोषण देने वाली, नीलवर्णी खेतों वाली, सुख देने वाली तथा नदियों एवं सरोवरों से समृद्ध है।

श्री पटेल ने कहा कि भारत के पहले राष्ट्रपति डॉ. राजेन्द्र प्रसाद ने 1950 में 'वंदे मातरम' को राष्ट्रीय गीत का दर्जा दिया। आज भी, जब वंदे मातरम गीत गाने या उसे सुनने पर मातृभक्ति और मां भारती की आराधना का भाव जागृत हो जाता है। उन्होंने अनुरोध किया कि, आज जब प्रधानमंत्री के प्रयासों से हमें एक बार फिर वंदे मातरम् गीत के शब्दों को जीने की प्रेरणा मिली है, तब इस अवसर पर सभी नागरिक स्वदेशी पर बल दें और आत्मनिर्भर भारत के निर्माण की दिशा में आगे बढ़ें।

मुख्यमंत्री ने स्वदेशी के वंदे मातरम् गीत के साथ सीधे संबंध का विशेष रूप से उल्लेख करते हुए कहा कि 1906 में गुजरात में अहमदाबाद में स्वदेशी वस्तुओं की प्रदर्शनी आयोजित हुई, तब गुजरात की धरती पर पहली बार 'वंदे मातरम्' गीत गाया गया था। उस समय गुजरात की इस पावन भूमि पर मातृभूमि के विकास और स्वदेशी वस्तुओं के बीच संबंध स्थापित हुआ था।

हिंदी हिन्दुस्तान की स्वीकृति से एचटीडीएस कॉन्टेंट सर्विसेज़ द्वारा प्रकाशित