बैतूल , जनवरी 22 -- मध्यप्रदेश के आदिवासीबहुल बैतूल जिले का एक गांव आज भी ऐसा है, जहां महिलाएं रेत में गड्ढे खोदकर पानी निकालती हैं।
जिले के शाहपुर विकासखंड की रामपुर भत्तोंडी पंचायत का आदिवासी गांव दानवाखेड़ा 2026 में भी स्वच्छ पेयजल से वंचित है। ग्रामीण झिरिया और नदी के दूषित पानी से प्यास बुझा रहे हैं। ये पानी अब तक दो मासूम बच्चों की जान ले चुका है। गांव की महिलाएं रेत में गड्ढे खोदती हैं, वहां रिसता पानी इकट्ठा करती हैं और उसी से खाना बनता है, बच्चों की प्यास बुझती है। ऐसे में बीमारियों का खतरा भी बढ़ता है। खुजली, त्वचा रोग और पेट की गंभीर समस्याएं यहां आम हो चुकी हैं।
दिसंबर में ग्रामीणों ने प्रशासन से गुहार लगाई थी। अधिकारी गांव पहुंचे, हैंडपंप खुदवाने का भरोसा दिया और रास्ता तैयार करने को कहा। ग्रामीणों ने श्रमदान कर रास्ता बना दिया, लेकिन एक महीने बाद भी न हैंडपंप लगा, न साफ पानी पहुंचा।
विगत 20 जनवरी को श्रमिक आदिवासी संगठन और समाजवादी जन परिषद के नेतृत्व में ग्रामीणों ने एडीएम और जिला पंचायत सीईओ को ज्ञापन सौंपा।
संगठन नेता राजेंद्र गढ़वाल ने बताया कि दूषित पानी से दो बच्चों की मौत हो चुकी है, फिर भी वन विभाग की अनुमति का हवाला देकर काम रोका जा रहा है।
करीब 600 आबादी वाले दानवाखेड़ा में सड़क, बिजली, स्कूल और स्वास्थ्य सुविधाएं तक नहीं हैं। ग्रामीणों ने खुद पगडंडी बनाकर रास्ता निकाला, लेकिन पीने के पानी के लिए आज भी उन्हें नदी और झिरिया के गंदे पानी पर निर्भर रहना पड़ रहा है।
पीएचई विभाग के शाहपुर एसडीओ योगेश धुर्वे ने बताया कि दानवाखेड़ा गांव आरक्षित वन क्षेत्र में बसा है। ये लोग छिंदवाड़ा जिले से आकर बसे हैं। विभाग ने हैंडपंप खुदाई के लिए वन विभाग से अनुमति मांगी है परंतु अभी अनुमति नहीं मिली है वन विभाग से अनुमति मिलते ही विभाग हैंडपंप खनन कर देगा।
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