बीजापुर/सुकमा , जनवरी 26 -- छत्तीसगढ़ के बस्तर संभाग के लिए इस वर्ष का गणतंत्र दिवस ऐतिहासिक साबित हुआ है। दशकों से नक्सली, उग्रवाद से जूझ रहे इस अंचल के दो सबसे संवेदनशील जिलों बीजापुर और सुकमा के दुर्गमतम इलाकों में पहली बार राष्ट्रीय ध्वज फहराया गया। यह केवल एक समारोह नहीं, बल्कि शांति, विश्वास और लोकतंत्र की उस स्थापना का प्रतीक है, जिसके लिए सुरक्षा बलों, प्रशासन और स्थानीय समुदाय ने लंबा संघर्ष किया है।

बीजापुर जिले का वह दृश्य अविस्मरणीय था, जहां माओवादियों के पारंपरिक 'कोर एरिया' माने जाने वाले कर्रेगुट्टा हिल्स की 5000 फुट की ऊंचाई पर एक नव स्थापित सुरक्षा कैंप में सुबह-सुबह तिरंगा लहराया गया। इस दुर्गम पहाड़ी क्षेत्र में, जहां तक पहुंचना कभी सुरक्षा बलों के लिए एक बड़ी चुनौती हुआ करती थी, आज वहां ध्वजारोहण के समय सुरक्षा जवानों के साथ-साथ आसपास के गांवों के सैकड़ों ग्रामीण और स्कूली बच्चे मौजूद थे।

समारोह की शुरुआत एक प्रभात फेरी के साथ हुई, जिसमें बच्चों ने छोटे-छोटे तिरंगे हाथ में लिए और "वंदे मातरम्" व "जय हिंद" के नारों से पूरे परिवेश को देशभक्ति की भावना से सराबोर कर दिया। ध्वजारोहण के पावन क्षण के दौरान कई बुजुर्ग ग्रामीणों की आंखें नम थीं। एक ग्रामीण ने भावुक होकर कहा, "ये पहाड़ और ये जंगल हमेशा से हमारे थे लेकिन डर के कारण हम इसे अपना नहीं पाते थे। आज यहां जो झंडा लहरा रहा है, वह हमारी आजादी और हमारे अधिकार का झंडा है।"यह सफलता सुरक्षा बलों की सतत मौजूदगी और 'विकास एवं विश्वास' की रणनीति का परिणाम है। पिछले कुछ महीनों में इस क्षेत्र में कई नए सुरक्षा कैंप स्थापित किए गए हैं, जिन्होंने न केवल सुरक्षा का माहौल बनाया है, बल्कि ग्रामीणों को प्रशासनिक सेवाओं और विकास की मुख्यधारा से जोड़ने का काम भी किया है।

वहीं, सुकमा जिले ने भी आज एक नया इतिहास रचा। जिले के दस धुर नक्सल प्रभावित गांवों- तुमालभट्टी, वीरागंगलेर, मैता, पालागुड़ा, गुंडाराजगुंडेम, नागाराम, वंजलवाही, गोगुंडा, पेदाबोडकेल और उरसांगल में पहली बार गणतंत्र दिवस समारोह आयोजित किए गए और तिरंगा फहराया गया। इन गांवों में से कई ऐसे थे, जहां पिछले दो-तीन दशकों में कभी भी राष्ट्रीय पर्व नहीं मनाया गया था।

सुकमा पुलिस की 'विश्वास आधारित अभियान' रणनीति के तहत, इन गांवों में पहले सुरक्षा कैंप स्थापित किए गए, फिर नागरिकों के साथ निरंतर संवाद बनाया गया। इसका परिणाम आज देखने को मिला जब ग्रामीणों ने बिना किसी भय के समारोह में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। महिलाओं, बुजुर्गों और बच्चों ने एकसाथ राष्ट्रगान गाया और राष्ट्रभक्ति के गीतों पर थिरके।

सुकमा के पुलिस अधीक्षक किरण चव्हाण ने इस उपलब्धि को जिले के लिए एक मील का पत्थर बताया। उन्होंने कहा, "तुमालभट्टी से लेकर उरसांगल तक के इन दस गांवों में आज जो तिरंगा लहरा रहा है, वह सिर्फ कपड़े का एक टुकड़ा नहीं है। यह हर उस ग्रामीण के हौसले और हमारे संकल्प का प्रतीक है, जो अब नक्सलवाद के भय से मुक्त होकर लोकतंत्र की मुख्यधारा में वापस लौट रहा है। हमारा फोकस अब सुरक्षा के साथ-साथ तेजी से विकास कार्यों को लेकर है।"बीजापुर के कर्रेगुट्टा हिल्स से लेकर सुकमा के दूरस्थ गांवों तक के इस सफर में कई कारकों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। रणनीतिक सुरक्षा विस्तार से दोनों जिलों में सैकड़ों नए सुरक्षा कैंपों और चौकियों की स्थापना ने इन दुर्गम क्षेत्रों में सुरक्षा बलों की निरंतर उपस्थिति सुनिश्चित की। विश्वास निर्माण अभियान में केवल सुरक्षा उपायों से आगे बढ़कर, प्रशासन और पुलिस ने ग्रामीणों के साथ संवाद बनाया, उनकी समस्याएं सुनी और त्वरित विकास कार्य शुरू किए।इसके अलावा स्थानीय समुदाय की सहभागिता ने अंततः इस ऐतिहासिक बदलाव की सबसे बड़ी शक्ति वे ग्रामीण साबित हुए, जिन्होंने भय की दीवारों को तोड़कर सुरक्षा बलों के साथ हाथ मिलाया।

राज्य के गृहमंत्री विजय शर्मा के मुताबिक, इस बार राज्य के 47 ऐसे स्थानों पर भी राष्ट्र ध्वज फहराया गया जहां आज से पहले नक्सल प्रभावित इलाका होने की वजह से राष्ट्र ध्वज नहीं फहराया जाता था।

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