अलवर , जनवरी 16 -- राजस्थान के अलवर में गड़ियां लोहार समाज की सामाजिक एकता और परंपराओं का अद्भुत उदाहरण उस समय देखने को मिला जब 90 वर्षीय बुजुर्ग जागा के निधन के बाद गुरुवार की रात उनकी शव यात्रा पूरे सम्मान और धूमधाम के साथ निकाली गयी।
यह भव्य शव यात्रा सूर्य नगर डी-ब्लॉक से प्रारंभ होकर एन.ई.बी. श्मशान घाट तक पहुंची, जिसमें समाज के सैकड़ों लोग शामिल हुए। उनके निधन कीखबर मिलते ही पूरे गड़ियां लोहार समाज में शोक की लहर दौड़ गयी। समाज की परंपरा के अनुसार, इस शोक को सम्मान और सामूहिक सहयोग में बदलते हुये अंतिम विदाई को भव्य रूप दिया गया।
प्राप्त जानकारी के अनुसार शव यात्रा की खास बात यह रही कि इसमें सबसे आगे जयपुर से विशेष रूप से मंगवाया गया हाथी चल रहा था। हाथी को पारंपरिक सजावट के साथ तैयार किया गया था, जो पूरी यात्रा के आकर्षण का केन्द्र बना रहा। हाथी के पीछे घोड़े, डीजे वाहन और समाज के लोग चल रहे थे। डीजे की धुन पर समाज के युवक नाचते-गाते नजर आये, वहीं पारंपरिक बाजों की गूंज ने पूरे माहौल को अलग ही रंग दे दिया।
परिजनों और समाज के लोगों के अनुसार, इस पूरे आयोजन पर करीब तीन लाख रुपये का खर्च आया। यह राशि गड़ियां लोहार समाज के लोगों ने आपसी सहयोग से एकत्र की। समाज में यह परंपरा वर्षों से चली आ रही है कि किसी भी सदस्य के निधन पर पूरा समाज आर्थिक और सामाजिक रूप से साथ खड़ा होता है, ताकि अंतिम संस्कार पूरे सम्मान के साथ किया जा सके।
बुजुर्ग के पोते रोहित ने बताया कि उनके दादा जागा समाज में बेहद सम्मानित व्यक्ति थे। उन्होंने कहा, " हमारे समाज में जब किसी बुजुर्ग की मृत्यु होती है, तो पूरा समाज मिलकर सहयोग करता है। इसी सहयोग से जयपुर से हाथी मंगवाया गया और भव्य शव यात्रा निकाली गयी। यह हमारे समाज की पुरानी परंपरा है, जिसे अब भी पूरी श्रद्धा के साथ निभाया जाता है। "शव यात्रा के दौरान मार्ग में बड़ी संख्या में लोग शामिल हुये। कई स्थानों पर लोगों ने पुष्पवर्षा करके बुजुर्ग को अंतिम प्रणाम किया। समाज के स्वयंसेवकों ने व्यवस्था संभाली, जिससे यात्रा शांतिपूर्ण और अनुशासित तरीके से संपन्न हो सके।
एन.ई.बी. श्मशान घाट पहुंचने के बाद विधि-विधान के साथ अंतिम संस्कार किया गया। अंतिम संस्कार के दौरान माहौल भावुक हो गया, लेकिन साथ ही समाज की एकजुटता और परंपराओं पर गर्व भी साफ नजर आया।
गड़ियां लोहार समाज की यह शवयात्रा न केवल एक व्यक्ति की अंतिम विदाई थी, बल्कि यह समाज की संस्कृति, परंपरा और सामूहिक सहयोग की मजबूत मिसाल भी बनी।
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