श्रीगंगानगर , अक्टूबर 27 -- राजस्थान में श्रीगंगानगर स्थापना दिवस पर तीन दिवसीय गंग महोत्सव के अंतिम दिन सोमवार को देर शाम सूरतगढ़ में आयोजित कार्यक्रम 'शाम रेत के धोरों पर' ने खूब रंग जमाया।
रेतीले टिब्बों पर रेगिस्तान के जहाज ऊंट सहित घोड़ों के नृत्य एवं अन्य करतब देख आमजन मन्त्रमुग्ध रह गए। समापन समारोह में राजस्थानी नृत्य, लोक कलाकारों और सूफी नाइट की प्रस्तुतियों ने भी सबका मन मोह लिया।
हनुमान खेजड़ी धाम के पास धोरों पर आयोजित भव्य कार्यक्रम में ऊंट नृत्य एवं सफारी, चारपाई पर नाचते ऊंट एवं घोड़ी के अनोखे नृत्यों ने दर्शकों को रोमांचित कर दिया। मश्क वादन दल के कलाकार, कच्छी घोड़ी दल के कलाकार और पारंपरिक वेशभूषा में सजे-धजे रौबीले कलाकारों ने आंगुतकों का स्वागत किया।
इसके बाद राजस्थानी सांस्कृतिक संध्या शुरू हुई। मां सरस्वती की पूजा अर्चना के साथ कार्यक्रम का शुभारंभ किया गया। भवई, चरी नृत्य की प्रस्तुति के बाद लोक कलाकारों ने केसरिया बालम आओ नी पधारो म्हारे देश, तेरी मिट्टी में मिल जावा, म्हारो लहरिया रे, कालो कूद पड्यो मेला में सहित अन्य राजस्थानी प्रस्तुतियों ने समां बांध दिया।
राजस्थानी लोक सांस्कृतिक संध्या के बाद सूफी नाइट ने भी खूब मनोरंजन किया। ग़ज़ल गायक अब्दुल हाफ़िज़ की चुपके-चुपके रात दिन आसूं बहाना याद है, चाँदी जैसा रंग है तेरा और सूफी गायक फिदा हुसैन की नित खैर मंगा तेरी दुआ ना होर मंगदी, अंखिया उडीक दिया दिल वाजा मारदा की प्रस्तुतियों पर आमजन झूम उठे।
कार्यक्रम में रावला के कलाकारों ने मश्क, ढोल और मंजीरे बजाते हुए प्रस्तुति दी जबकि निवाई टोंक के कलाकारों द्वारा कच्छी घोड़ी नृत्य और स्वागत को खूब सराहा गया। बालोतरा-बाड़मेर के कलाकारों ने गैर नृत्य और बीकानेर के रौबीले कलाकारों ने राजस्थानी पोशाक में खूब रंग जमाया। चित्तौड़गढ़ से आए कलाकारों ने बहरूपिया रूप धरकर बच्चों का मनोरंजन किया जबकि जोधपुर के कलाकारों ने कालबेलिया नृत्य और बीकानेर के चुरकला नृत्य को महिलाओं ने खूब पसंद किया। फायर और चरी नृत्य के साथ-साथ जयपुर से आए कलाकारों ने कृष्ण रास और फूलों की होली खेलते हुए समारोह को आकर्षक बना दिया।
हिंदी हिन्दुस्तान की स्वीकृति से एचटीडीएस कॉन्टेंट सर्विसेज़ द्वारा प्रकाशित