रायसेन (मध्य प्रदेश) , अप्रैल 11 -- केंद्रीय कृषि एवं ग्रामीण विकास मंत्री शिवराज चौहान ने शनिवार को कहा कि देश के सभी विशिष्ट जलवायु और कृषि परिस्थिति वाले अंचलों में खेती बाड़ी में आसानी देने वाले रोडमैपों को तैयार करने की योजना पर काम किया जा रहा है और इस तरह का पहला खास रोड मैप मध्य प्रदेश के- चार एक जैसी कृषि जलवायु वाले जिलों देवास, रायसेन, श्योहर और विदिशा के बारे में रविवार जारी किया जाएगा।
श्री चौहान यहां तीन दिवसीय उन्नत कृषि महोत्सव 2026 के प्रथम दिन उद्घाटन सत्र के बाद संवाददाताओं से बातचीत कर रहे थे। उन्होंने कहा कि विश्व प्रसिद्ध सांची बौद्ध स्तूप के लिए विख्यात रायसेन और उसके साथ लगे एक जैसी कृषि जलवायु वाले तीन अन्य जिलों का रोडमैप में कल इसी मेले में जारी किया जाएगा। कृषि वैज्ञानिकों ने इस अंचल की मिट्टी धूप और वर्षा का बारीकी से अध्ययन कर यह कृषि-दिग्दर्शक- मानचित्र तैयार किया है। इसके माध्यम से किसानों को उपयुक्त फसलों, बीजों के किस्म , उससे जुड़ी अन्य गतिविधियों के बारे में सलाह दी जाएगी।
उन्होंने बताया कि आंध्र प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में भी अलग-अलग कृषि जलवायु क्षेत्रों के लिए इस तरह के रोड मैप तैयार करने पर काम चल रहा है। उन्होंने कहा कि हमारे पास 16,000 वैज्ञानिकों की टीम है। कृषि राज्यों का विषय है इसलिए हम उनके साथ अपनी टीम के साथ पूरे सहयोग के लिए तैयार हैं।
श्री चौहान ने कहा," हम वैज्ञानिक तरीके से तैयार हुए इस तरह के अलग-अलग कृषि जलवायु अंचलों के किसानों को बीज से लेकर बाजार तक के बारे में सलाह देंगे। हमारी इच्छा है कि सभी राज्य इस काम में सहयोग करें।" उनका मानना था कि सभी राज्यों में अगर इस तरह का रोड मैप तैयार कर उसके अनुसार चला जाए तो 5 साल में पूरे देश में खेती का कायाकल्प हो सकता है। उन्होंने कहा कि इस रोड मैप को केंद्र और राज्य की कृषि संबंधी योजनाओं के साथ जोड़ा जाएगा ताकि इसका आधिकारिक लाभ हो सके।
श्री चौहान ने कहा कि मौसम में बदलाव अब बहुत खास चीज बन चुका है और बेमौसम बरसाल, पश्चिमी विक्षोभ तथा तापमान में अनिश्चितता के कारण खेती पर सीधा असर पड़ रहा है। उन्होंने बताया कि वैज्ञानिक संस्थान ऐसी फसल किस्में विकसित कर रहे हैं, जो अधिक गर्मी भी सह सकें, ज्यादा पानी की स्थिति में भी टिकाऊ रहें और कम पानी की स्थिति में भी अच्छा प्रदर्शन कर सकें, और इन किस्मों को तेजी से किसानों तक पहुँचाने के प्रयास जारी हैं।
कृषि यंत्रों को छोटे किसानों तक पहुंचने की कस्टम हायरिंग सेंटर योजना को मजबूती से लागू करने का प्रयास है। उन्होंने स्पष्ट किया ने स्पष्ट किया कि सरकार का फोकस केवल व्यक्तिगत मशीन सब्सिडी तक सीमित नहीं, बल्कि गाँव स्तर पर साझा उपयोग के लिए कस्टम हायरिंग सेंटर और फार्म मशीनरी बैंक का नेटवर्क विकसित करना है।
उन्होंने कहा कि पंचायतों, किसान समूहों, एफपीओ और स्वयं सहायता समूहों के माध्यम से ऐसे सेंटर स्थापित किए जा रहे हैं, जहाँ से छोटे और सीमांत किसान भी किराये पर आधुनिक कृषि उपकरण ले सकें। उन्होंने बताया कि केंद्र की सब-मिशन ऑन एग्रीकल्चरल मेकनाइजेशन (एस एम एस एम) जैसी योजनाओं के तहत परियोजना लागत पर 40 से 80 प्रतिशत तक वित्तीय सहायता उपलब्ध कराई जा रही है, ताकि लगभग 30 लाख रुपये तक की परियोजनाओं पर भी पंचायतों और किसान संगठनों को मजबूत समर्थन मिल सके।
मीडिया के एक सवाल पर कि क्या एमपी लैड्स की निधि से भी कस्टम हायरिंग सेंटर जिम की तरह बनवाए जा सकते हैं, श्री चौहान ने साफ कहा कि एमपी लैड्स का उद्देश्य स्थायी सामुदायिक परिसंपत्तियाँ बनाना है, जैसे सड़कें, स्कूल, स्वास्थ्य, खेल सुविधाएँ और स्थिर जिम आदि, जबकि कस्टम हायरिंग सेंटर संचालन और किराये के मॉडल पर आधारित होते हैं, जिनके लिए अलग प्रकार की व्यवस्था और संचालन ढांचा चाहिए। उन्होंने कहा कि कस्टम हायरिंग सेंटरों को हम एमपी लैंड से नहीं, बल्कि कृषि मशीनीकरण और संबंधित योजनाओं से ही बढ़ावा दे रहे हैं, ताकि नीति की भावना और पारदर्शिता दोनों बनी रहे।
श्री चौहान ने यह भी कहा कि सांसद और विधायक अपने क्षेत्रों में कृषि मशीनीकरण योजनाओं के बेहतर क्रियान्वयन में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। वे किसान समूहों, एफपीओ और पंचायतों के प्रस्तावों को राज्य और केंद्र सरकार के समक्ष प्रभावी ढंग से उठाकर, स्वीकृति, निगरानी और समस्याओं के समाधान में सहयोग कर सकते हैं। उन्होंने कहा कि जनप्रतिनिधियों की सक्रियता से ही योजनाओं का लाभ सही मायने में अंतिम छोर के किसान तक पहुँचता है।
कस्टम हायरिंग मॉडल में प्राइवेट सेक्टर की सीमित भागीदारी पर पूछे गए सवाल पर मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने कहा कि कुछ राज्यों में निजी कंपनियाँ और उद्यमी पहले से ही आगे आकर काम कर रहे हैं और जहाँ‑जहाँ स्थिर मांग, स्पष्ट नीति और स्थानीय साझेदारी मिलती है, वहाँ यह मॉडल सफल होता है। उन्होंने कहा कि सरकार की कोशिश है कि एफपीओ, पंचायत और प्राइवेट सेक्टर मिलकर पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप के रूप में ऐसे केंद्र विकसित करें, ताकि मशीनें भी चलती रहें और किसान को सस्ती और समय पर सेवा भी मिल सके।
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