रामनगर , जनवरी 03 -- विश्व प्रसिद्ध कॉर्बेट टाइगर रिजर्व में इन दिनों ऑल इंडिया टाइगर एस्टिमेशन का महत्वपूर्ण कार्य पूरे जोर-शोर से चल रहा है, इस महाअभियान में जहां आधुनिक तकनीक और वैज्ञानिक तरीकों का इस्तेमाल किया जा रहा है वहीं महिला वनकर्मी भी बाघों की गणना में अहम भूमिका निभाकर नयी मिसाल कायम कर रही हैं। तीन चरणों में होने वाली इस गिनती में कॉर्बेट पार्क के दुर्गम जंगलों में महिला वन दरोगा मानसी अरोड़ा अपनी टीम के साथ सक्रिय रूप से कार्य कर रही हैं।
महिला वन दरोगा मानसी अरोड़ा ने बताया कि बाघों की गणना केवल कैमरों तक सीमित नहीं होती, बल्कि इसके लिए जंगल के हर कोने में पैदल चलकर प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष संकेत जुटाने पड़ते हैं, इस कार्य में उनके साथ रेंज अधिकारी नवीन चंद्र पांडे, रमन सिंह, मोहन उप्रेती सहित कई अनुभवी वनकर्मी भी शामिल हैं, सभी टीम सदस्य मिलकर कठिन परिस्थितियों में जंगल के भीतर कई-कई किलोमीटर पैदल चलकर डेटा एकत्र कर रहे हैं।
गौरतलब है कि इस समय पूरे देश में अखिल भारतीय बाघ आकलन (ऑल इंडिया टाइगर एस्टिमेशन) किया जा रहा है, इसी क्रम में बाघों के घनत्व के लिए विश्व प्रसिद्ध कॉर्बेट टाइगर रिजर्व में भी यह प्रक्रिया जारी है। पार्क प्रशासन द्वारा इसके लिए कई टीमें गठित की गई हैं, जिनमें महिला वनकर्मियों की भागीदारी विशेष रूप से उल्लेखनीय है।
कॉर्बेट टाइगर रिजर्व के निदेशक डॉ. साकेत बडोला ने बताया कि यह बाघ गणना दुनिया की सबसे बड़ी वाइल्डलाइफ एक्सरसाइज मानी जाती है और इसका नाम गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड में भी दर्ज है,यह पूरी प्रक्रिया तीन चरणों में संपन्न होती है।
पहले चरण में साइन सर्वे किया जाता है। इस दौरान वनकर्मी पूरे क्षेत्र में घूमकर बाघ और अन्य वन्यजीवों के प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष संकेत एकत्र करते हैं,इनमें बाघ के पगचिह्न, मल, पंजों के निशान, पेड़ों या जमीन पर खरोंच जैसे साक्ष्य शामिल होते हैं,यह सारा डेटा इकोलॉजी एप और एम-स्ट्राइप्स (एम-एसटीआरआईपीईएस) ऐप के माध्यम से मोबाइल फोन में दर्ज किया जाता है। इसी चरण में हाथी जैसे अन्य प्रमुख वन्यजीवों के संकेत भी रिकॉर्ड किए जाते हैं।
दूसरे चरण में ट्रांजिट लाइन या ट्रांजिट वॉक की जाती है,इसमें पहले से निर्धारित दो किलोमीटर लंबी ट्रांजिट लाइनों पर वनकर्मी जीपीएस, रेंज फाइंडर, कम्पास और मोबाइल के साथ पैदल चलते हैं,इस दौरान क्षेत्र में मौजूद शाकाहारी वन्यजीवों की संख्या और उपस्थिति का आकलन किया जाता है, क्योंकि इन्हीं पर बाघों की आबादी निर्भर करती है,इस चरण में एक बीट में वनकर्मी 5 से 15 किलोमीटर तक पैदल चलकर पूरी बीट को कवर करते हैं।
तीसरा और अंतिम चरण कैमरा ट्रैपिंग का होता है। इस चरण में कॉर्बेट टाइगर रिजर्व के पूरे क्षेत्र में 1050 से अधिक कैमरा ट्रैप लगाए गए हैं,केंद्र सरकार से दिशा-निर्देशों के अनुसार हर दो किलोमीटर पर एक पॉइंट पर दो कैमरा ट्रैप स्थापित किए गए हैं। कुल 550 से अधिक पॉइंट्स पर ये कैमरे लगाए गए हैं, जिन्हें 45 दिनों तक जंगल में सक्रिय रखा जाता है। इस दौरान वनकर्मी समय-समय पर उनकी मॉनिटरिंग भी करते हैं।
डॉ. साकेत बडोला ने बताया कि कैमरा ट्रैप से प्राप्त तस्वीरों को पहले एआई आधारित सॉफ्टवेयर में डाला जाता है, जहां बाघों की तस्वीरों को अलग किया जाता है। इसके बाद 'एक्सट्रैक्ट-कम्पेयर' सॉफ्टवेयर के जरिए बाघों की धारियों (स्ट्राइप्स) का मिलान कर प्रत्येक बाघ को अलग-अलग पहचान दी जाती है। इससे यह पता लगाया जाता है कि कौन सा बाघ किस क्षेत्र में, किस दिन मौजूद था।
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