नयी दिल्ली , दिसंबर 11 -- भारतीय सैन्य इतिहास में 11 दिसंबर 1971 की वह शाम एक अदम्य साहस की गाथा लिख गई जब बांग्लादेश (तत्कालीन पूर्वी पाकिस्तान) में भारत का बिजली-सा तेज़ अभियान अपने चरम पर था, तो टांगाइल के धान के खेतों पर पैराशूट बटालियन का एक तेज मगर निर्णायक ऑपरेशन हुआ। ढाका से महज 56 किलोमीटर दूर किया गया यह बेहद खास अभियान पाकिस्तान सेना के लिए ढहती दीवारों पर आखिरी कील साबित हुआ।
टांगाइल पर उतरे पैराशूट से उतरे जवानों ने ढाका की ओर भाग रही पाकिस्तानी सेना के लिए वापसी का आखिरी रास्ता काट दिया। इसके ठीक पाँच दिन बाद, जनरल ए.ए.के. नियाज़ी की फौजों ने हथियार डाल दिये और ढाका के पतन की कहानी लिख दी गयी। आसमान से छतरी लेकर जमीन पर उतरे इन पैराशूटर्स का कारनामा आज भी दक्षिण एशियाई सैन्य इतिहास के सबसे साहसी हवाई अभियानों में से एक माना जाता है।
मगर, इस शानदार सफलता की नींव किसी हवाई जहाज़ से नहीं, बल्कि एक युवा सिग्नल अधिकारी कैप्टन प्रशांत कुमार घोष के गुप्त मिशन से रखी गई थी। कोडनेम "पीटर" के तहत काम कर रहे कैप्टन घोष, जंग शुरू होने से कई दिनों पहले ही पूर्वी पाकिस्तान में कदम रख चुके थे।
एक साधारण 'लुंगी' और फटी हुई कमीज़ में, हाथ में एक स्टेन गन और क्रिस्टल-ट्यून्ड रेडियो लेकर, कैप्टन घोष ने दुश्मन के क्षेत्र में कदम रखा। उनका मिशन आइने की तरह साफ था। उनका काम था सुरक्षित लैंडिंग ज़ोन खोजना, बंगलादेश की आजादी के लिए लड़ रही मुक्ति वाहिनी के साथ संपर्क बनाना, दुश्मन के खेमे में तोड़फोड़ करना और पैरा कमांडोज़ को मार्गदर्शन देना।
ऑपरेशन की जड़ें भारतीय सेना की पूर्वी कमान के आकलन में थीं, जिसने पूंगली पुल (जमालपुर-टांगाइल-ढाका पर) को एक रणनीतिक 'चोक पॉइंट' माना। इस पुल पर कब्जे का मतलब था मैमनसिंह से पीछे हट रही पाकिस्तानी 93 इन्फैंट्री ब्रिगेड को ढाका में दोबारा जुटने से रोकना।
कैप्टन घोष को लेफ्टिनेंट जनरल जे.एफ.आर. जैकब (ऑपरेशंस के मास्टरमाइंड) ने अचानक तलब किया। लेफ्टिनेंट जनरल जैकब की बात बेहद तीखी लेकिन तार्किक थी। उन्होंने कहा , "तुम एक पैराट्रूपर हो, सिग्नलर हो, कमांडो हो, बंगाली हो, और तुमने जॉइंट एयर वॉरफेयर स्कूल में टॉप किया है।"कैप्टन घोष को, उनकी इच्छा के विरुद्ध, 1971 के सबसे जोखिम भरे मिशनों में से एक में शामिल किया गया।
मध्य नवंबर तक, कैप्टन घोष को सीमा पार भेज दिया गया। सेना के शीर्ष अधिकारियों ने साफ कर दिया था कि पकड़े जाने पर भारत उनके अस्तित्व से इनकार कर देगा। उनके साथ केवल 'बादशाह' नाम का 14 वर्षीय मुक्ति वाहिनी प्रशिक्षु था, जिसकी स्थानीय बोलियों पर पकड़ अनमोल साबित हुई।
अगले 10 दिनों तक 'पीटर' ने मैमन सिंह और टांगाइल के बीच काम किया। उन्होंने मुक्ति वाहिनी कमांडर अब्दुल क़ादर सिद्दीकी की सेनाओं के साथ मिलकर पाकिस्तानी काफिलों की खुफिया जानकारी लगातार भारतीय पक्ष को भेजी। उन्होंने दो उपयुक्त जगह पहचानी और निर्णायक रूप से बताया कि ढाका पर तेज़ी से कब्ज़ा करने के लिए उत्तरी मार्ग ही सबसे बेहतर है।
जब सेकेंड पैरा रेजिमेंट ने 11 दिसंबर की शाम को पैराशूट से छलांग लगाई, तब तक कैप्टन घोष और लगभग 200 मुक्ति वाहिनी लड़ाकों ने लैंडिंग क्षेत्र को सुरक्षित कर लिया था।
उन्होंने न केवल बटालियन को पूंगली पुल तक पहुंचाया, बल्कि अंधेरे में बिखरे हुए भारी साजो-सामान को भी जुटाया। 12 तारीख की दोपहर तक, 95 माउंटेन ब्रिगेड के अग्रणी तत्वों ने पैराट्रूपर्स से संपर्क स्थापित कर लिया। पुल की रखवाली कर रही पाकिस्तानी सेना पीछे हटी, और बटालियन ने भाग रही 93 इन्फैंट्री ब्रिगेड पर घात लगाकर भारी नुकसान पहुंचाया।
इस कार्रवाई ने भारतीय सेना के लिए ढाका का रास्ता खोल दिया। यह 'रेड बेरेट्स' के नेतृत्व में राजधानी की उस प्रसिद्ध "दौड़" शुरुआत थी, जिसकी परिणति 16 दिसंबर की सुबह ढाका में विजय पूर्ण प्रवेश के साथ हुई।
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