बेंगलुरु , जनवरी 09 -- कर्नाटक ने केरल के प्रस्तावित मलयालम भाषा विधेयक 2025 पर औपचारिक रूप से आपत्ति दर्ज कराते हुए दावा किया है कि इससे सीमावर्ती जिले कासरगोड के कन्नड़ भाषी अल्पसंख्यकों के लिए खतरा पैदा हो सकता है।
कर्नाटक के मुख्यमंत्री सिद्दारमैया ने इस विधेयक को भाषाई स्वतंत्रता पर हमला बताया है और कहा है कि कन्नड़ भाषा, सीमावर्ती निवासियों की पहचान और उनकी गरिमा का अभिन्न अंग है। उन्होंने चेतावनी दी कि यह कानून सीमावर्ती कासरगोड जिले के कन्नड़ लोगों को उनकी मातृभाषा सीखने के अधिकार से वंचित करता है। मुख्यमंत्री ने केरल के मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन से इस विधेयक को तत्काल वापस लेने का आग्रह किया है और कहा है कि कर्नाटक अल्पसंख्यक अधिकारों की रक्षा के लिए सभी कानूनी रास्ते अपनाएगा।
उल्लेखनीय है कि इससे पहले 2017 में भी इसी तरह के एक प्रस्ताव को कन्नड़ भाषी आबादी के अधिकारों से जुड़ी चिंताओं के कारण राष्ट्रपति ने खारिज कर दिया था। मौजूदा मलयालम भाषा विधेयक 2025 का उद्देश्य केरल के सभी सरकारी, सहायता प्राप्त और निजी स्कूलों में मलयालम को अनिवार्य पहली भाषा के रूप में स्थापित करना है। केरल सरकार जहां इस विधेयक को क्षेत्रीय पहचान बनाये रखने और प्रशासनिक एकरूपता सुनिश्चित करने वाले उपाय के रूप में देख रही है, वहीं कर्नाटक के अधिकारियों का तर्क है कि कासरगोड में अल्पसंख्यक स्कूलों पर इसे लागू करना भारतीय संविधान के अनुच्छेद 30, 347, 350, 350क और 350ख का उल्लंघन है। ये अनुच्छेद भाषाई अल्पसंख्यकों के अधिकारों की रक्षा करते हैं।
कर्नाटक सीमा क्षेत्र विकास प्राधिकरण ने केरल के राज्यपाल राजेंद्र विश्वनाथ अर्लेकर को इस संबंध में एक ज्ञापन सौंपा है। इस ज्ञापन में चिंता जतायी गयी है कि यह प्रस्तावित कानून कन्नड़ माध्यम के स्कूलों सहित सभी विद्यालयों में कक्षा एक से 10 तक मलयालम को पहली भाषा के रूप में अनिवार्य बनाता है। प्रतिनिधिमंडल ने चेतावनी दी है कि यह कदम भाषाई अल्पसंख्यकों को हाशिए पर धकेल सकता है और संवैधानिक सुरक्षा का उल्लंघन करता है।
श्री अर्लेकर ने इस कानून की व्यापक समीक्षा करने का आश्वासन दिया है।
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