चंडीगढ़ , नवंबर 06 -- पंजाब आम आदमी पार्टी (आप) के एक प्रतिनिधिमंडल ने वित्त मंत्री हरपाल सिंहचीमा के नेतृत्व में गुरुवार को पंजाब के राज्यपाल गुलाब चंद कटारिया से मुलाकात की। इस दौरान उन्होंने पंजाब यूनिवर्सिटी की लोकतांत्रिक रूप से चुनी गयी सीनेट और सिंडिकेट को भंग करने के केंद्र सरकार के एकतरफा कदम के खिलाफ एक मांग पत्र सौंपा।
प्रतिनिधिमंडल में सांसद गुरमीत सिंह मीत हेयर और मलविंदर सिंह कंग, विधायक दिनेश चड्ढा और वरिष्ठ नेता गोल्डी कंबोज, दविंदर सिंह लाडी ढोंस, छात्र नेता वतनवीर गिल और पीयू सीनेट सदस्य आई.पी. सिद्धू और रविंदर धालीवाल शामिल थे।
प्रतिनिधिमंडल ने केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय के 28 अक्टूबर के उस नोटिफिकेशन का कड़ा विरोध किया, जिसने सीनेट की कानूनी सदस्य संख्या 90 से घटाकर सिर्फ 31 कर दी, जिनमें से 13 सदस्य सीधे तौर पर केंद्र द्वारा मनोनीत किए जाएंगे। 'आप' ने इसे पंजाब और पंजाब यूनिवर्सिटी के लोकतांत्रिक अधिकारों, स्वायत्तता और पहचान पर सीधा हमला बताया।
वित्तमंत्री चीमा ने कहा कि केंद्र सरकार ने पंजाब यूनिवर्सिटी के उस लोकतांत्रिक ढांचे को तबाह कर दिया है, जो पिछले 60 सालों से सफलतापूर्वक काम कर रहा था। सीनेट की ताकत घटाकर और सिंडिकेट को भंग करके, केंद्र पंजाब के शैक्षणिक संस्थानों पर कब्जा करना चाहता है। बीबीएमबी पर कब्जा करने की कोशिश करने के बाद, भाजपा अब हमारी यूनिवर्सिटी को निशाना बना रही है।
श्री चीमा ने कहा कि इस फैसले का असर पंजाब भर के 200 से ज्यादा मान्यता प्राप्त कॉलेजों और लाखों छात्रों पर पड़ेगा। उन्होंने कहा कि यह सिर्फ एक यूनिवर्सिटी का मामला नहीं है, यह पंजाब के स्वाभिमान पर हमला है और पंजाबीयत को मिटाने की कोशिश है। केंद्र ने पहला नोटिफिकेशन वापस लिया और एक मिनट बाद दूसरा जारी कर उसे 'लंबित' रख दिया। यह दोहरा खेल पंजाब यूनिवर्सिटी की स्वायत्तता को तबाह करने के उनके असली इरादे को दर्शाता है।
'आप' सांसद मलविंदर सिंह कंग ने कहा कि केंद्र का नोटिफिकेशन गैर-संवैधानिक है और पंजाब यूनिवर्सिटी एक्ट, 1947 का उल्लंघन करता है, जिसे पंजाब विधानसभा ने पास किया था। उन्होंने कहा कि शिक्षा मंत्रालय को राज्य के कानून (एक्ट) के जरिए स्थापित संस्थाओं में संशोधन करने या उन्हें भंग करने का कोई अधिकार नहीं है। सांसद गुरमीत सिंह मीत हेयर ने कहा कि बंटवारे के बाद, जब पंजाबियों ने लाहौर में अपने घर और विरासत खो दी, तब पंजाब यूनिवर्सिटी वह पहली संस्था बनी जो हमारे पुनर्जन्म का प्रतीक थी। यह सिर्फ एक यूनिवर्सिटी नहीं है, यह पंजाब के इतिहास और पहचान का एक जीता-जागता हिस्सा है। केंद्र का बार-बार हस्तक्षेप न केवल गैर-संवैधानिक है, बल्कि पंजाबियों की भावनाओं के प्रति गहरा असंवेदनशील भी है।
प्रतिनिधिमंडल ने राज्यपाल गुलाब चंद कटारिया से पंजाब यूनिवर्सिटी की स्वायत्तता, लोकतांत्रिक ढांचे और सांस्कृतिक पहचान की रक्षा करने के लिए हस्तक्षेप करने की अपील की।
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