नयी दिल्ली , अप्रैल 14 -- केंद्रीय मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह ने चिकित्सा शिक्षा में कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) के बढ़ते उपयोग के बावजूद मजबूत नैदानिक आधार की आवश्यकता पर जोर देते हुए कहा कि एआई एक सहायक उपकरण के रूप में उपयोगी है, लेकिन बिना मूलभूत चिकित्सा ज्ञान के इसका उपयोग डॉक्टरों को कमजोर बना सकता है।
श्री सिंह ने यह बात "बाल गैस्ट्रोएंट्रोलॉजी, हेपेटोलॉजी और पोषण" विषय पर आधारित पाठ्यपुस्तक के दूसरे संस्करण के विमोचन के दौरान कही। इस पुस्तक का संपादन अनुपम सिबल और डॉ. सरथ गोपालन ने किया है।
श्री सिंह ने कहा कि चिकित्सा क्षेत्र में तेजी से बढ़ते शोध और ज्ञान के बीच अवधारणा-आधारित शिक्षण और व्यावहारिक अनुभव बेहद जरूरी है। यदि डॉक्टर केवल तकनीक पर निर्भर रहेंगे, तो वे चुनौतीपूर्ण परिस्थितियों में प्रभावी इलाज करने में सक्षम नहीं हो पाएंगे।
श्री सिंह ने चिकित्सा शिक्षा प्रणाली को समय-समय पर अपडेट करने की जरूरत पर भी बल दिया, ताकि नई तकनीकों और जटिल बीमारियों के अनुसार डॉक्टरों को तैयार किया जा सके।
इस पुस्तक में 45 अध्याय शामिल हैं, जिनमें गैस्ट्रोइंटेस्टाइनल और यकृत संबंधी रोगों, आनुवंशिकी, एंडोस्कोपी और लिवर ट्रांसप्लांट जैसे विषयों को विस्तार से समझाया गया है। विशेषज्ञों के अनुसार, बाल रोग विशेषज्ञों के पास आने वाले लगभग 30 प्रतिशत बच्चे पाचन और यकृत से जुड़ी समस्याओं से प्रभावित होते हैं, जिससे इस क्षेत्र में विशेषज्ञता की आवश्यकता और बढ़ जाती है। यह पुस्तक बाल रोग विशेषज्ञों, प्रशिक्षुओं और चिकित्सा क्षेत्र के पेशेवरों के लिए एक महत्वपूर्ण संदर्भ सामग्री साबित हो सकती है।
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