जेहनपोरा (बारामूला) , जनवरी 10 -- श्रीनगर-झेलम घाटी सड़क के किनारे स्थित जेहनपोरा के टीले इन सर्दियों के मौसम में शांत हो गये हैं, लेकिन इस नीरवता में भी ये टीले बौद्ध धर्म की ऐतिहासिक कहानी की याद दिलाते हैं।
बारामूला के इस स्थान पर हुई खुदाई ने कश्मीर घाटी के बौद्ध इतिहास को एक बार फिर चर्चा के केंद्र में ला दिया है। पुरातत्वविदों का दावा है कि ये टीले 2,000 साल पुराने कुषाण कालीन बौद्ध परिसर के हो सकते हैं।
गत दिसंबर में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के 'मन की बात' कार्यक्रम से सुर्खियों में आयी इस खोज का पहला संकेत तीन स्तूपों की एक दुर्लभ फ्रांसीसी ऐतिहासिक तस्वीर से मिला था। इसकी खुदाई अप्रैल में दोबारा होने वाली है, जिसमें घाटी के भूले-बिसरे बौद्ध अतीत के बारे में और खुलासे होने की उम्मीद है।
पुरातत्वविदों ने बताया कि कश्मीर के जेहनपोरा गांव में पिछले साल खोजा गया यह बौद्ध स्थल सर्दियों के कारण खुदाई के लिए बंद कर दिया गया और अप्रैल में एक बार फिर तीन महीनों के लिए काम शुरू होगा।
स्थानीय लोग पहले इस क्षेत्र का उपयोग मनोरंजन के लिए किया करते थे, लेकिन अब इस स्थल को कंटीले तारों और पुलिस की मौजूदगी से संरक्षित कर दिया गया है।
यह स्थान श्रीनगर-झेलम घाटी सड़क के करीब है, जो 1950 तक श्रीनगर-जम्मू राजमार्ग पर जवाहर सुरंग के निर्माण से पहले बाहरी दुनिया के साथ कश्मीर का एकमात्र विश्वसनीय संपर्क मार्ग था।
इस खोज के नेतृत्वकर्ता प्रो मोहम्मद अजमल शाह ने कहा कि खुदाई, कश्मीर विश्वविद्यालय के मध्य एशियाई अध्ययन विभाग और अभिलेखागार तथा पुरातत्व एवं संग्रहालय विभाग संयुक्त रूप से कर रहे हैं।
श्री शाह ने इस खोज को हाल के वर्षों में कश्मीर की सबसे महत्वपूर्ण पुरातात्विक खोजों में से एक बताया। प्रो शाह ने कहा कि उनकी टीम ने कई वर्षों तक इस क्षेत्र का सर्वेक्षण किया और वह वहां मौजूद तीन बड़े टीलों के कारण आश्वस्त थे कि यह एक प्रमुख ऐतिहासिक स्थल है।
प्रो शाह ने बताया कि 2023 में पेरिस में रिसर्च फेलोशिप के दौरान उन्हें वहां के संग्रहालय में एक पुरानी तस्वीर मिली, जिसमें कश्मीर में एक बड़े बौद्ध स्तूप को दिखाया गया था।
प्रो शाह ने कहा, "उस फ्रांसीसी संग्रहालय के ऐतिहासिक फोटोग्राफी अनुभाग में मुझे ब्रिटिश यात्रियों की ली गयी कश्मीर की कई पुरानी तस्वीरें मिलीं। उनमें से एक में कश्मीर के स्तूपों के गुंबद दिखाये गये थे। मैंने तुरंत उसकी पहचान जेहनपोरा के रूप में कर ली, जहां मैं वर्षों से जा रहा था। कश्मीर आने के बाद हमने आगे सर्वेक्षण किया और खुदाई के लिए सरकार से संपर्क किया।"श्री शाह ने कहा कि पिछले 100 वर्षों में परिदृश्य बदल गया है। उम्मीद है कि इसके आकार पर भी असर पड़ा होगा। उन्होंने कहा कि 1970 के दशक में लोअर झेलम जलविद्युत परियोजना के एक नहर के निर्माण के दौरान इस स्थल के कुछ हिस्से क्षतिग्रस्त हो गये थे, जिस कारण यह स्थल हिस्सों में विभाजित हो गया था। स्थानीय निवासियों ने पुरातत्वविदों को बताया है कि नहर के निर्माण के दौरान उन्हें पत्थर की दीवारें मिली थीं।
इस जगह की औपचारिक खुदाई पिछले वर्ष अक्टूबर में शुरू हुई थी, जब कश्मीर विश्वविद्यालय ने अभिलेखागार विभाग के साथ एक सहमति पत्र पर हस्ताक्षर किये थे। इस दौरान उन्हें नीचे एक दीवार और हॉल मिला, जो कश्मीर में कुषाण काल की एक बड़ी बौद्ध बस्ती का संकेत देता है।
प्रो शाह ने कहा कि यह खोज प्राचीन कश्मीर के एक ऐसे काल पर प्रकाश डालती है, जिसका अध्ययन अभी बहुत कम हुआ है। उन्होंने कहा कि पुराने रास्तों के चौराहों पर इस स्थल की स्थिति बताती है कि यह अतीत में महत्वपूर्ण केंद्र रहा होगा।
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