नयी दिल्ली , नवंबर 17 -- उच्चतम न्यायालय ने सोमवार को तमिलनाडु सरकार की उस याचिका पर सुनवाई दो दिसंबर तक स्थगित कर दी, जिसमें मद्रास उच्च न्यायालय द्वारा राज्य संचालित विश्वविद्यालयों के कुलपतियों की नियुक्ति के राज्यपाल के अधिकार को समाप्त करने वाले राज्य संशोधनों पर अंतरिम रोक को चुनौती दी गई थी।
न्यायमूर्ति सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची की पीठ ने मामले की सुनवाई की।
तमिलनाडु सरकार ने इसी मुद्दे पर मद्रास उच्च न्यायालय में लंबित जनहित याचिका को शीर्ष न्यायालय में स्थानांतरित करने के लिए एक स्थानांतरण याचिका भी दायर की है। सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने दलील दी कि इस मामले में विधेयकों पर राज्यपाल की स्वीकृति की समय-सीमा से संबंधित लंबित राष्ट्रपति संदर्भ के परिणाम का इंतजार करना पड़ सकता है।
तमिलनाडु सरकार की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता डॉ. एएम सिंघवी ने हालांकि तर्क दिया कि यह मुद्दा राष्ट्रपति संदर्भ से स्वतंत्र है, क्योंकि संशोधन तमिलनाडु राज्यपाल के फैसले में शीर्ष न्यायालय द्वारा घोषित "मान्य स्वीकृति" के आधार पर प्रभावी हुए है।
राज्य की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता पी. विल्सन ने उच्च न्यायालय के स्थगन आदेश के कारण उत्पन्न प्रशासनिक शून्यता पर चिंता व्यक्त की। उन्होंने कहा, "22 विश्वविद्यालयों में से 14 कुलपति विहीन हैं। मैं राज्य में कुछ भी करने में असमर्थ हूँ। एकपक्षीय स्थगन आदेश दिया गया था। यह एक तात्कालिक आवश्यकता है।"न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने कहा कि राज्य उच्च न्यायालय से 7-10 दिनों के भीतर मामले का तत्काल निर्णय लेने का अनुरोध कर सकता है, हालांकि अंततः शीर्ष न्यायालय ने मामले को दो दिसंबर के लिए सूचीबद्ध कर दिया।
तमिलनाडु विधायी संशोधनों ने कुलपतियों की नियुक्ति का अधिकार राज्यपाल (कुलाधिपति के रूप में) से राज्य सरकार को हस्तांतरित कर दिया, जो शीर्ष न्यायालय के उस फैसले पर आधारित था जिसमें राज्य की विधायी प्रक्रिया में राज्यपाल की शक्तियों का दायरा परिभाषित किया गया था।
मद्रास उच्च न्यायालय ने 21 मई, 2025 को इन संशोधनों के क्रियान्वयन पर रोक लगा दी। रिट याचिकाकर्ता के इस दावे पर गौर करते हुए कि ये 12 संशोधन यूजीसी विनियमों के विरुद्ध हैं, जिसके अनुसार कुलपतियों की नियुक्ति कुलाधिपति द्वारा एक खोज समिति द्वारा चुने गए पैनल में से की जानी चाहिए। राज्य सरकार ने रोक का विरोध करते हुए तर्क दिया कि जब तक प्रथम दृष्टया अवैध न हो, तब तक कानून पर रोक नहीं लगाई जा सकती।
याचिकाकर्ताओं द्वारा जिस राजपत्र अधिसूचना का सहारा लिया गया था, वह जाली थी, जिसमें सीबी-सीआईडी जाँच का अनुरोध किया गया था।
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