वाराणसी , दिसंबर 9 -- सर्वविद्या की राजधानी काशी में मंगलवार को रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के साथ आए रूसी प्रतिनिधिमंडल ने सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय का भ्रमण किया।

यह शैक्षणिक यात्रा भारत-रूस के बीच दो प्राचीन संस्कृतियों के स्पंदन का सुंदर संगम था। विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. बिहारी लाल शर्मा ने रूसी प्रतिनिधियों का पारंपरिक रूप से भव्य स्वागत किया। इस दौरान वैदिक मंत्रोच्चार भी परिसर में गुंजायमान रहा।

प्रो. शर्मा ने कहा कि भारत और रूस के बीच अद्वितीय मैत्री संबंध तथा परस्पर सांस्कृतिक समानता और एक-दूसरे के प्रति समर्पण भाव सदियों पुराना है। आज विश्व की दो महान विद्वता शक्तियाँ (भारत और रूस) मिलकर मानवता की रक्षा, सांस्कृतिक धरोहरों के संरक्षण और विश्व को मानवीय मार्ग पर ले जाने के लिए कटिबद्ध हैं। पिछले सात दशकों से रूस भारत के साथ निःस्वार्थ भाव से सहोदर भाई की तरह खड़ा रहा है और यह मैत्री परंपरा अहर्निश आगे बढ़ रही है।

उन्होंने कहा कि रूसी मेहमानों ने भारतीय ज्ञान परंपरा और सनातन धर्म-संस्कृति की गहन जानकारी प्राप्त की। सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय भारतीय संस्कृति के संरक्षण और संवर्धन का प्रमुख केंद्र है, जो भारत की आत्मा का साक्षात्कार कराता है। राष्ट्रपति पुतिन के साथ आए इस प्रतिनिधिमंडल के दौरे से दोनों देशों के बीच सांस्कृतिक एवं शैक्षिक संबंधों में नई ऊर्जा का संचार हुआ है तथा भविष्य में आदान-प्रदान को और बल मिलेगा।

प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व कर रहे रूस के काल्मिक स्टेट यूनिवर्सिटी (काल्मिकिया, एलिस्टा) के कुलपति प्रो. बतिर एलिस्टेव ने कहा, "दुनिया के सबसे प्राचीन नगर काशी में स्थित इस प्राचीन संस्था में आकर भारतीय ज्ञान परंपरा और सनातन धर्म-संस्कृति को निकट से जानने-सुनने का सुअवसर मिला। यह अत्यंत सुखद अनुभव रहा। यदि भारत को वास्तव में जानना हो तो काशी स्थित इस देववाणी संस्कृत के केंद्र के दर्शन और इसके मर्म को समझना आवश्यक है।"उन्होंने कहा कि देववाणी संस्कृत में निहित ज्ञानराशि में भारतीय संस्कृति, संस्कार और भारतीयता का संपूर्ण सार समाहित है। इस भ्रमण से रूस-भारत के दशकों पुराने संबंध और भी प्रगाढ़ होंगे। हमारे साथ आए सभी प्रतिनिधियों ने यहां की पारंपरिक शिक्षा पद्धति, संस्कृत के साथ-साथ बौद्ध दर्शन, प्राकृत एवं पाली आदि भाषाओं के अध्ययन को सूक्ष्मता से समझा, जिससे दोनों संस्कृतियों के मर्म को सहज ही ग्रहण किया जा सकता है।

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