बेंगलुरु , मार्च 25 -- कर्नाटक सरकार ने बुधवार को उन आलोचनाओं को खारिज कर दिया कि राज्य का प्रशासन कर्ज पर चल रहा है और कहा कि ऐसे दावे "सच्चाई से कोसों दूर" हैं तथा उधार लेना शासन का एक नियंत्रित हिस्सा है, जिसका उद्देश्य विकास एवं जन कल्याण है।

सरकार ने राज्य की वित्तीय स्थिति का बचाव करते हुए कहा कि उसने लगभग 4.48 लाख करोड़ रुपये के कुल बजट के मुकाबले 1.32 लाख करोड़ रुपये का ऋण लिया है। सरकार का तर्क है कि इसे "कर्ज आधारित बजट" नहीं कहा जा सकता। उसका मानना है कि कोई भी राज्य या देश बिना उधार लिए कार्य नहीं कर सकता और सभी ऋण निर्धारित सीमाओं के भीतर लिए गए हैं।

अधिकारियों ने उल्लेख किया कि राज्य पर कुल बकाया कर्ज करीब 8.24 लाख करोड़ रुपये है। उन्होंने यह भी जोड़ा कि 2008 और 2013 के बीच की भारतीय जनता पार्टी सरकार सहित पिछली सरकारों ने भी उधार का सहारा लिया था। सरकार ने कहा, "आमतौर पर हर पांच साल में कर्ज का स्तर दोगुना हो जाता है।" साथ ही उन्होंने इस ओर भी इशारा किया कि हाल के वर्षों में केंद्र सरकार के कर्ज में भी काफी बढ़ोतरी हुई है।

सरकार ने आगे दावा किया कि बढ़ता कर्ज होने के बावजूद, कर्नाटक आर्थिक रूप से मजबूत प्रदर्शन कर रहा है। एक रिपोर्ट का हवाला देते हुए कहा गया कि दक्षिण भारतीय राज्य राष्ट्रीय सकल घरेलू उत्पाद में महत्वपूर्ण योगदान देते हैं, जिसमें कर्नाटक अग्रणी योगदानकर्ताओं में से एक है, जबकि देश की समग्र विकास दर राज्य की तुलना में पीछे है।

सरकार ने इन आलोचनाओं पर कि कल्याणकारी गारंटियों के कारण कर्ज बढ़ा है, कहा कि उसने अब तक गारंटी योजनाओं पर 1.31 लाख करोड़ रुपये खर्च किए हैं और निरंतर वार्षिक आवंटन सुनिश्चित किया है। इसकी तुलना महाराष्ट्र से करते हुए कहा गया कि वहां कथित तौर पर कल्याणकारी योजनाओं के आवंटन में समय के साथ कमी की गई है। सरकार ने यह भी स्पष्ट किया कि 'युवानिधि' योजना बंद नहीं की गई है और इसके लिए 600 करोड़ रुपये निर्धारित किए गए हैं।

राजकोषीय घाटे की चिंताओं पर सरकार ने स्वीकार किया कि वर्तमान बजट राजस्व घाटे को दर्शाता है। सरकार ने 2026-27 के बजट में राजस्व अधिशेष प्राप्त करने का इरादा व्यक्त किया, लेकिन इस कमी के लिए केंद्र से सहयोग की कमी को जिम्मेदार ठहराया। राज्य ने वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) राजस्व पर भी चिंता जताई और कहा कि जहां कर्नाटक ने 10 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की थी, वहीं केंद्र के दरों में कटौती करने की वजह से यह गिरकर 4 प्रतिशत रह गई। उन्होंने कहा कि सात राज्यों ने इस कदम का विरोध किया है और मुआवजे की मांग की है।

जीएसटी मुआवजे के प्रभाव पर प्रकाश डालते हुए प्रदेश सरकार ने कहा कि केंद्र ने 2023-24 तक मुआवजा प्रदान किया था, लेकिन उसके बाद इसे बंद कर दिया, जो राज्य में कांग्रेस के सत्ता में आने के समय के साथ हुआ। इससे 10,000 करोड़ रुपये के राजस्व की कमी हुई है और 2026-27 में 15,000 करोड़ रुपये के और नुकसान की आशंका है, जिससे राज्य की वित्त व्यवस्था पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है।

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