बेंगलुरु , मार्च 24 -- कर्नाटक विधान परिषद में मंगलवार को अडानी समूह के कामकाज को लेकर तीखी राजनीतिक झड़प देखने को मिली। इस तरह का आरोप लगाया गया है कि इसकी सहायक कंपनी एसीसी लिमिटेड ने भारी बकाया राशि और खनन पट्टा समाप्त होने के बावजूद कलबुर्गी में खनन कार्य जारी रखा।

प्रश्नकाल के दौरान उठाये गये इस मुद्दे ने जल्द ही अडानी से जुड़ी इस कंपनी के प्रति सरकार के रवैये पर बड़े विवाद का रूप ले लिया। कांग्रेस और भाजपा दोनों ही दलों के सदस्यों ने सवाल उठाया कि कंपनी के खिलाफ अब तक कड़ी कार्रवाई क्यों नहीं की गयी है।

कांग्रेस के विधान पार्षद के शिवकुमार ने आरोप लगाया कि वाडी स्थित कन्नूर लाइमस्टोन ब्लॉक में उत्खनन जारी रहने के बावजूद एसीसी रॉयल्टी, किराया और जुर्माने के रूप में 850 करोड़ रुपये से अधिक का बकाया चुकाने में विफल रही है।

उन्होंने दावा किया कि कानूनी राय में यह सलाह दी गयी थी कि बकाया चुकाने तक खनन की अनुमति न दी जाये। इसके बावजूद कोई कार्रवाई शुरू नहीं की गयी। इसके उलट, सरकार पट्टे के नवीनीकरण प्रक्रिया को सुविधाजनक बनाने की दिशा में आगे बढ़ गयी। बड़े कॉरपोरेट घरानों को मिलने वाली कथित तरजीह पर निशाना साधते हुए श्री शिवकुमार ने कहा कि छोटे खदान संचालकों को भुगतान न करने पर तत्काल जब्ती और जुर्माने का सामना करना पड़ता है, जबकि एक बड़ी कॉरपोरेट इकाई को कथित तौर पर परिचालन जारी रखने की अनुमति दी गयी है।

उन्होंने सदन में कहा, "अडानी समूह के उत्खनन का काम संभालने के बाद, उन्हें रॉयल्टी के रूप में 837 करोड़ रुपये का भुगतान करना था। उसने आज तक इसका भुगतान नहीं किया है।"भाजपा के विधान परिषद सदस्य सीटी रवि ने उस कानूनी ढांचे पर सवाल उठाये, जिसके तहत बकाया राशि वाली कंपनी को बोली में भाग लेने और परिचालन जारी रखने की अनुमति दी गयी। उन्होंने इस पर स्पष्टता मांगी कि क्या कोई नियम ऐसी छूट देता है और अब तक वसूली क्यों लागू नहीं की गयी।

इन आरोपों के जवाब में खान एवं भूविज्ञान मंत्री की ओर से कृषि मंत्री एन चेलुवारायस्वामी ने तर्क दिया कि अडानी समूह की कंपनी को कोई नया लाइसेंस जारी नहीं किया गया है और यह मामला कानूनी कार्यवाही में उलझा हुआ है। उन्होंने कहा कि खनन का जारी रहना अदालती निर्देशों के अधीन है और बकाया राशि पर विवाद का अभी पूरी तरह से फैसला होना बाकी है। उन्होंने स्पष्ट करते हुए कहा, "पुराना लाइसेंस अदालती आदेश के तहत जारी है। हम कानूनी प्रक्रिया का पालन कर रहे हैं।" उन्होंने यह भी कहा कि भुगतान का एक हिस्सा जमा कर दिया गया है और शेष राशि पर अदालत का निर्णय लिया जायेगा।

मंत्री के इस स्पष्टीकरण से हालांकि किसी भी दल के सदस्य संतुष्ट नहीं हुए। सदस्यों का तर्क था कि अदालती कार्यवाही सरकार को बकाया राशि की वसूली से नहीं रोकती है। इस विवाद ने राज्य के खनन राजस्व पर भी ध्यान केंद्रित किया, जहां यह चिंता जतायी गयी कि इतनी बड़ी बकाया राशि को अनसुलझा छोड़ने से 'गैर-कर राजस्व' पर महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ सकता है।

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