बेंगलुरु , अप्रैल 23 -- कर्नाटक में विभिन्न राजनीतिक पार्टियों के छात्र संगठनों ने अपने वैचारिक मतभेदों को दरकिनार कर एक सुर में राज्य के सभी कॉलेजों में छात्र संघ चुनावों को तुरंत कराने मांग की है।

बेंगलुरु में राज्य उच्च शिक्षा परिषद के ऑडिटोरियम में हुई बैठक में कांग्रेस, भारतीय जनता पार्टी (भाजजा), जनता दल सेक्युलर और वामपंथी पार्टियों से जुड़े छात्र संगठनों ने मिलकर सरकार पर ज़ोर दिया कि वे मौजूदा शैक्षणिक सत्र से ही चुनाव शुरू करें। यह लंबे समय के बाद कैंपस की चुनावी राजनीति को फिर से बहाल करने की दिशा में एक एकजुट प्रयास का संकेत है।

यह अनोखी सहमति तब बनी, जब मुख्यमंत्री सिद्दारमैया ने 2026-27 के बजट में उच्च शिक्षा संस्थानों में छात्र चुनावों को फिर से शुरू करने के सरकार के इरादे की घोषणा की थी। इस घोषणा पर हालांकि सकारात्मक प्रतिक्रियाएँ मिली थीं, लेकिन बुधवार की बैठक पहली बार थी जब विरोधी छात्र समूहों ने बिना किसी प्रक्रियात्मक देरी के इसे तुरंत लागू करवाने के लिए औपचारिक रूप से हाथ मिलाया। चिकित्सा शिक्षा मंत्री शरण प्रकाश आर. पाटिल और उच्च शिक्षा मंत्री एम.सी. सुधाकर ने इन प्रतिनिधियों की बातें सुनीं तथा उन्हें आश्वासन दिया कि सरकार नियमों और दिशानिर्देशों को बनाने की प्रक्रिया में तेज़ी लाएगी और मुख्यमंत्री से इस पर जल्द कार्रवाई करने की सिफ़ारिश करेगी।

एकता के बावजूद हालाँकि कुछ मतभेद भी थोड़े समय के लिए सामने आए। अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (अभाविप) ने पात्रता के लिए ज़्यादा सख़्त नियम बनाने की माँग की, जिसमें न्यूनतम उपस्थिति और साफ़-सुथरा अनुशासन रिकॉर्ड शामिल है। वहीं भारतीय राष्ट्रीय छात्र संघ (एनएसयूआई) और जदए के छात्र प्रतिनिधियों ने इन पाबंदियों का विरोध किया। उन्होंने चेतावनी दी कि इन पाबंदियों से ऐसे छात्र बाहर हो सकते हैं जो राजनीति में सक्रिय हैं, खासकर वे जो विरोध-प्रदर्शनों में हिस्सा लेते हैं। इसके साथ ही वामपंथी विचारधारा से जुड़े समूहों ने छात्र संगठनों में व्यवस्थित प्रतिनिधित्व और महिलाओं के लिए आरक्षण की माँग ज़ोर-शोर से उठाई।

जद(एस) से जुड़े एक प्रतिनिधि ने कन्नड़ बोलने वाले छात्रों के लिए आरक्षण का प्रस्ताव रखा, जिससे इन चर्चाओं में एक क्षेत्रीय पहलू भी जुड़ गया। वहीं, बेंगलुरु के एक मेडिकल छात्र ने कहा कि छात्र प्रतिनिधियों के पास कैंपस के कार्यक्रमों से बाहर कोई स्पष्ट अधिकार नहीं हैं। उन्होंने माँग की कि उन्हें संस्थागत फ़ैसलों में भी सार्थक रूप से शामिल किया जाए। इन मतभेदों के बावजूद, एक मुख्य संदेश लगातार बना रहा। कैंपस में एक व्यवस्थित चुनावी प्रक्रिया फिर से शुरू होनी चाहिए।

इसके जवाब में, सरकार ने संकेत दिया कि इस प्रक्रिया का ढाँचा मुख्य रूप से जे.एम. लिंगदोह समिति की सिफ़ारिशों पर आधारित होगा, जिसमें आज की ज़रूरतों के हिसाब से कुछ बदलाव किए जाएँगे। अलग-अलग विचारधाराओं के बीच यह दुर्लभ तालमेल कर्नाटक की छात्र राजनीति के परिदृश्य में एक बड़ा बदलाव है। यह कई सालों की अनुपस्थिति के बाद, कैंपस में व्यवस्थित छात्र राजनीति की वापसी का रास्ता खोल सकता है।

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