बेंगलुरु , फरवरी 12 -- उच्चतम न्यायालय ने कर्नाटक के कलबुर्गी जिले के अलंद शहर में लाडले मशाक दरगाह पर महाशिवरात्रि पूजा रोकने की मांग करने वाली याचिका पर सुनवाई करने से मना कर दिया और पूजा जारी रखने की इजाज़त दे दी।

इस साल 15 फरवरी को महाशिवरात्रि पर दरगाह के भीतर मौजूद राघव चैतन्य शिवलिंग की पूजा होनी है। याचिकाकर्ता ने संविधान के अनुच्छेद 32 का हवाला देते हुए न्यायालय का दरवाज़ा खटखटाया था जिसमें प्रावधान है कि यदि किसी व्यक्ति को प्रतीत होता है कि उसके मौलिक अधिकारों का हनन हो रहा है, तो वह इस अनुच्छेद के तहत शीर्ष न्यायालय का दरवाज़ा खटखटा सकता है।

न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता और न्यायमूर्ति एससी शर्मा की पीठ ने कहा कि संपत्ति या स्थानीय धार्मिक रीति-रिवाजों पर हर विवाद अनुच्छेद 32 के तहत नहीं आता। इसे उच्च न्यायालय या दूसरी प्रशासनिक इकाइयों के फैसलों का लांघने के लिए 'शॉर्टकट' के तौर पर इस्तेमाल नहीं किया जा सकता।

याचिकाकर्ता ने दलील दी कि पूजा की इजाज़त देने से दरगाह का धार्मिक रूप बदल जाएगा, जिसे वक्फ घोषित किया गया था। उन्होंने उस जगह के नवीनीकरण, निर्माण और पूजा की इजाज़त मांगने वाले न्यायालय के पहले के आदेश का हवाला दिया। शीर्ष न्यायालय ने कोई रोक लगाने से मना कर दिया, और पूजा जारी रखने की इजाज़त दे दी।

उल्लेखनीय है कि 14वीं सदी के सूफी संत लाडले मशाक के नाम पर बनी लाडले मशाक दरगाह में 15वीं सदी के हिन्दू संत राघव चैतन्य की समाधि भी है। उस जगह पर शिवलिंग ऐतिहासिक रूप से दोनों समुदायों के भक्तों को अपनी ओर खींचता रहा है। हिन्दू पारंपरिक रूप से वहां पूजा करते रहे हैं।

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