आइजोल , फरवरी 29 -- मिज़ोरम विधानसभा के अध्यक्ष लालबियाकज़ामा ने गुरुवार को कहा कि 1892 के चिन-लुशाई सम्मेलन में लिये गये अंग्रेज़ों के औपनिवेशिक प्रशासन के फैसलों को पूरी तरह से लागू न करने की विफलता के आज भी ज़ो लोगों पर दूरगामी परिणाम हो रहे हैं।
ज़ो रीयूनिफिकेशन ऑर्गनाइजेशन (ज़ोरो) द्वारा आयोजित चिन-लुशाई सम्मेलन की 134वीं वर्षगांठ को संबोधित करते हुए श्री लालबियाकज़ामा ने कहा कि औपनिवेशिक सरकार ने सभी ज़ोफाते (जातीय मिज़ो) को एक ही प्रशासनिक इकाई के तहत लाने का संकल्प लिया था, लेकिन इसे पूरा करने में विफल रही। उन्होंने कहा कि अलग-अलग देशों के तहत दशकों के अलगाव के कारण ज़ोफाते समुदायों के बीच भाषा, दृष्टिकोण, व्यवहार और मूल्यों में मामूली भिन्नताएं आयी हैं। उन्होंने ज़ोर दिया कि इन मतभेदों के बावजूद, साझा वंश और सामान्य मूल उन्हें एक साथ बांधे हुए हैं।
श्री लालबियाकज़ामा ने एकता की अपील करते हुए कहा कि राजनीतिक या प्रशासनिक एकीकरण की अनुपस्थिति में भी ज़ोफाते एक समाज के रूप में एकजुट रह सकते हैं। उन्होंने सीमाओं के पार ज़ो समुदायों के बीच एकता को बढ़ावा देने के लिए 1988 से ज़ोरो के निरंतर प्रयासों की भी सराहना की।
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