दरभंगा , फरवरी 05 -- नॉर्थ ईस्टर्न हिल यूनिवर्सिटी, शिलांग के इतिहास विभाग के प्रोफेसर (डॉ०) अमरेंद्र ठाकुर ने गुरूवार को कहा कि औपनिवेशिक काल में एक ओर सामान्य इतिहास तथा दूसरी ओर आदिवासी समाज का इतिहास (एथनोग्राफी) लिखा जा रहा था, जिसमें भारत को सही रूप में समझने का प्रयास नहीं हुआ।

ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय के स्नातकोत्तर इतिहास विभाग एवं डॉ. प्रभात दास फाउंडेशन के संयुक्त तत्वावधान में 'मध्यकालीन भारतीय इतिहास में सर यदुनाथ सरकार का योगदान' विषय पर आयोजित सेमिनार में बतौर मुख्य वक्ता प्रोफेसर अमरेंद्र ठाकुर ने अपने व्याख्यान में यदुनाथ सरकार की प्रमुख पुस्तकों की चर्चा, उन्नीसवीं सदी में अंग्रेज़ों द्वारा लिखे गए इतिहास की प्रवृत्तियाँ और आधुनिक भारतीय इतिहास लेखन में यदुनाथ सरकार की भूमिका पर प्रकाश डाला। उन्होंने मैकॉले का उल्लेख करते हुए बताया कि किस प्रकार भारतीय इतिहास को हीन दृष्टि से देखा गया। ऐसे समय में सरकार ने इतिहास लेखन की एक नई, वैज्ञानिक और आलोचनात्मक परंपरा की शुरुआत की। सर यदुनाथ सरकार कई भाषाओं में दक्ष थे तथा फ़ारसी स्रोतों का काफ़ी व्यापक प्रयोग किया।उनके इतिहास- लेखन के तीन प्रमुख आयाम रहें ब्रिटिश दृष्टिकोण का प्रतिवाद मूल दस्तावेज़ों एवं पांडुलिपियों का प्रयोग और इतिहास को कथा से निकालकर एक अनुशासित अकादमिक विषय के रूप में स्थापित करना।

विषय-प्रवेश करते हुए प्रोफेसर नैय्यर आज़म ने सर यदुनाथ सरकार के ऐतिहासिक योगदानों पर विस्तार से प्रकाश डालते हुए मुगल इंडिया, औरंगज़ेब एवं शिवाजी से संबंधित उनके शोध कार्यों और पुस्तकों की गहन चर्चा की।

अध्यक्षीय संबोधन देते हुए विभागाध्यक्ष डॉ. अनिल कुमार चौधरी ने कहा कि यदि व्यक्ति साधना और निरंतर प्रयास करे, तो वह असंभव को भी संभव बना सकता है।

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