भुवनेश्वर , जनवरी 03 -- ओडिशा सरकार ने राज्य में चल रही धान खरीद प्रक्रिया में पारदर्शिता और निष्पक्षता सुनिश्चित करने की दिशा में एक बड़ा कदम उठाते हुए कृषि भूखंडों को सत्यापित करने के लिए सैटेलाइट आधारित सत्यापन प्रणाली को अपनाया है।
यहां जारी एक बयान में बताया गया है कि सेटेलाइट-आधारित सत्यापन प्रणाली का लक्ष्य अयोग्य पंजीकरण और सार्वजनिक संसाधनों के दुरुपयोग को रोककर असली किसानों के हितों की रक्षा करना है। यह पहल खरीफ मौसम के दौरान धान की खेती वाली भूमि की पहचान में सटीकता सुनिश्चित करती है।सेटेलाइट आधारित सत्यापन का उपयोग करके संदिग्ध गैर-खेती वाले धान के भूखंडों की व्यवस्थित रूप से पहचान की जा रही है और उनका गहन क्षेत्र सत्यापन किया जा रहा है। यह प्रक्रिया पंजीकृत भूमि पार्सल में वास्तविक धान की खेती की पुष्टि करने और गैर-खेती वाले क्षेत्रों का सटीक पता लगाने मेंमदद करती है।
अब तक, 30 जिलों में कुल 26,14,137 भूखंडों की पहचान फील्ड सर्वेक्षण के लिए की गयी है। इनमें से 24,94,437 भूखंडों का सत्यापन पूरा हो चुका है।आधिकारिक सूत्रों ने बताया कि सेटेलाइट से ली गयी तस्वीरों से संदिग्ध पाये गये सभी भूखंड का अनिवार्य रूप से फील्ड सत्यापन किया जा रहा है। अब तक हुए सत्यापन के आधार पर, 5,46,591 भूखंड धान की खेती वाली ज़मीन के रूप में पुष्टि हुई है, जबकि लगभग 19 लाख भूखंड गैर-धान खेती वाली ज़मीन के रूप में पहचाने गये हैं। जिला पंजीयक सहकारी समितियों (डीआरसीएस) के अधिकारियों को उन किसानों को कारण बताओ नोटिस जारी करने का निर्देश दिया है, जिन्होंने खरीफ विपणन के मौसम (केएमएस) 2025-26 के तहत गलती से गैर-खेती वाली ज़मीन को धान के खेत के रूप में पंजीकृत किया है। सेटेलाइट सत्यापन प्रक्रिया तीन-चरणीय तंत्र का पालन करती है। शुरू में, सेटेलाइट इमेज का उपयोग करके संदिग्ध भूखंड की पहचान की जाती है, जिसके बाद ज़िला अधिकारियों द्वारा भौतिक सत्यापन किया जाता है। अंतिम चरण में सत्यापित भूखंड को ज़िला स्तर पर डीआरसीएस अधिकारियों द्वारा पारित किया जाता है। एक बार मंजूरी मिलने के बाद धान की खेती वाले पुष्ट भूखंड के लिए टोकन जेनरेट किये जाते हैं। जिन भूखंड को संदिग्ध के रूप में वर्गीकृत किया गया है, या जो गैर-धान वाली ज़मीन पाये गये हैं, उनके लिए टोकन जारी नहीं किये जाते हैं।
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