भुवनेश्वर , दिसंबर 09 -- मुख्यमंत्री मोहन चरण माझी ने घोषणा की कि प्रतिष्ठित राष्ट्रगीत "वंदे मातरम्" की 150वीं वर्षगांठ के उपलक्ष्य में ओडिशा के प्रत्येक ज़िले, स्कूल, विश्वविद्यालय और सांस्कृतिक केंद्र में "वंदे मातरम्" के समारोह आयोजित किए जाएंगे।
ओडिशा विधानसभा में वक्तव्य देते हुए श्री माझी ने कहा कि वंदे मातरम् का प्रत्येक शब्द भारत के स्वतंत्रता आंदोलन के नेतृत्व और उसकी भावना का प्रतीक है। उन्होंने इस समारोह को सभी विधायकों, सांसदों और जनप्रतिनिधियों के लिए इस विरासत को स्वीकार करने का एक पवित्र अवसर बताया।
श्री माझी ने संसद में प्रधानमंत्री की उन टिप्पणियों को याद किया, जिनमें उन्होंने उस समय की घटनाओं पर गहरा दुःख व्यक्त किया था। उन्होंने कहा कि ऐसी यादें राष्ट्र को सतर्क रहने की याद दिलाती हैं ताकि वैसी परिस्थितियाँ फिर कभी वापस न आएँ। अतीत का स्मरण करते हुए श्री माझी ने कहा कि जब वंदे मातरम् का 50वाँ वर्ष था, तब देश औपनिवेशिक शासन के अधीन था और अपने 100वें वर्ष में देश आपातकाल की बाध्यताओं से बंधा हुआ था। उस समय संविधान का दमन किया गया था और कई देशभक्तों को दमनकारी कानूनों के तहत जेलों में डाल दिया गया था।
वंदे मातरम को स्वतंत्रता संग्राम की आत्मा बताते हुए श्री माझी ने कहा कि इस गीत ने भारत को 1947 में स्वतंत्रता प्राप्ति के लिए प्रेरित किया। उन्होंने ज़ोर देकर कहा, "वंदे मातरम् के 150 वर्ष हमारी प्रेरणा और शक्ति हैं। हम 2047 तक एक विकसित भारत का निर्माण करेंगे।" उन्होंने कहा कि राष्ट्रगीत इस संकल्प को और मज़बूत करता है। वंदे मातरम् को "राष्ट्र की सच्ची शक्ति" बताते हुए श्री माझी ने कहा कि यह भारतीय संस्कृति के अविरल प्रवाह को दर्शाता है। उन्होंने कहा, "यह केवल वंदे मातरम् को याद करने का क्षण नहीं है, बल्कि नई ऊर्जा प्राप्त करने और आगे बढ़ने का क्षण है।"उन्होंने इस बात पर खेद व्यक्त किया कि इस गीत के केवल दो छंदों को ही राष्ट्रीय गीत के रूप में मान्यता दी गई और इसे कुछ वर्गों का तुष्टिकरण बताया। मुख्यमंत्री ने सवाल किया कि क्या आज इस गीत का विरोध करने वाले मौलाना अबुल कलाम आज़ाद, अशफ़ाक़उल्ला ख़ान या पूर्व राष्ट्रपति डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम जैसी हस्तियों से ज़्यादा ज्ञानी या देशभक्त हैं ,जिन्होंने वंदे मातरम् पूरी श्रद्धा से गाया था।
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