नयी दिल्ली , दिसंबर 10 -- ऑस्ट्रेलिया ने 16 वर्ष के कम आयु के बच्चों के सोशल मीडिया इस्तेमाल पर पाबंदी लगा दी है। कई अन्य देशों में किसी न किसी रूप में इस तरह के प्रतिबंध पहले से हैं और सिंगापुर, स्पेन, न्यूज़ीलैंड तथा मलेशिया जैसे कई देश अब तेज़ी से इस दिशा में काम कर रहे हैं।

कई शोधों में पाया गया है कि सोशल मीडिया का किशोरों पर हानिकारक असर पड़ता है, जो यह पढ़ाई में ध्यान न लगा पाने का कारण भी बनता है। यह दुनिया को देखने के गलत नज़रिये और उम्र के हिसाब से गलत काम का कारण भी बनता है। साेशल मीडिया पर हानिकारक कंटेंट के संपर्क में आना, साइबरबुलिंग गंभीर मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं की शुरुआत का कारण भी बन रहा है। इन मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं में कम उम्र में डिप्रेशन और दिमाग की बनावट में बदलाव शामिल हैं।

इन्हीं कारणों से पूरी दुनिया देख रही है कि ऑस्ट्रेलिया अपना नया कानून कैसे लागू करता है। मलेशिया 16 साल से कम उम्र के सोशल मीडिया उपयोगकर्ताओं को प्रतिबंधित करने की योजना बना रहा है, जिसे लागू करने की तारीख जनवरी 2026 है। इसी तरह न्यूज़ीलैंड ने भी ऐसे ही कानून में गहरी दिलचस्पी दिखाई है और एक मंत्री को जल्द ही एक नीति पत्र पेश करने का काम सौंपा गया है। सिंगापुर और स्पेन ने भी इस तरह के कानून बनाने की इच्छा व्यक्त की है।

ऑस्ट्रेलियाई सरकार ने ऑनलाइन सुरक्षा संशोधन अधिनियम को कई तरह की परेशानियों के एकल समाधान के तौर पर परोसा है। इस कानून का समर्थन करने वाले कई लोगों का मानना है कि यह बच्चों को ऑनलाइन दुनिया की हानियों से बचायेगा और लत लगाने वाले डिज़ाइन से संपर्क को सीमित करेगा। लेकिन इस बात के समर्थन में बहुत सीमित शोध मौजूद है कि प्रतिबंध लगाने से इस तरह के नतीजे हासिल हो सकेंगे।

इस प्रतिबंध के आलोचकों का कहना है कि यह सोशल मीडिया पर बच्चों के बहिष्करण और उनके दूसरे प्लेटफॉर्म्स पर पलायन का कारण बनेगा। इस विषय पर वाद-विवाद भावनाओं से परिपूर्ण दिखा लेकिन इस कानून के बारे में अहम बातों पर चर्चा ज़रूरी है। यह समझना बेहद अहम है कि यह बैन दरअसल करता क्या है।

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