प्रयागराज , फरवरी 07 -- मोबाइल गेमिंग और अत्यधिक स्क्रीन टाइम बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य पर गंभीर प्रभाव डाल रहे हैं। नोएडा में तीन सगी बहनों की आत्महत्या की घटना के बाद इस विषय पर चिंता और गहरा गई है। विशेषज्ञों का कहना है कि ऑनलाइन गेमिंग की लत बच्चों को अवसाद और आत्मघाती प्रवृत्तियों की ओर भी धकेल सकती है।

इसी क्रम में संगम नगरी प्रयागराज में भी एक मामला सामने आया है। हालांकि यहां बच्चा सुरक्षित है, लेकिन वह ऑनलाइन गेमिंग का आदी हो चुका है। परिजन उसे उपचार के लिए मोतीलाल नेहरू मंडलीय चिकित्सालय (काल्विन) के मनोरोग विभाग लेकर पहुंचे हैं।

सोरांव क्षेत्र के होलागढ़ निवासी छह वर्षीय बालक के माता-पिता दोनों नौकरीपेशा हैं। दिन में वह अपने दादा-दादी के साथ रहता है। परिजनों के अनुसार उसे मोबाइल फोन उपलब्ध करा दिया जाता था, जिस पर वह ऑनलाइन कोरियन गेम और ड्रामा कार्टून देखता रहता था। स्थिति यह हो गई कि बच्चा कोरियन भाषा के शब्द बोलने लगा।

मनोचिकित्सक डॉ. राकेश पासवान ने बताया कि जांच के दौरान जब उन शब्दों का अनुवाद किया गया तो पाया गया कि बच्चा वास्तव में कोरियन भाषा के शब्दों का प्रयोग कर रहा है। उन्होंने बताया कि बच्चे में 'वर्चुअल ऑटिज्म' जैसे लक्षण विकसित हो रहे हैं। फिलहाल बच्चे की काउंसलिंग शुरू कर दी गई है।

डॉ. पासवान के अनुसार अत्यधिक मोबाइल उपयोग से बच्चों में बोलने में देरी, एकाग्रता में कमी, चिड़चिड़ापन, आक्रामक व्यवहार और एंजाइटी की समस्या देखी जा रही है। स्क्रीन टाइम बढ़ने से आंखों पर दुष्प्रभाव, शारीरिक गतिविधियों में कमी के कारण मोटापा, हृदय संबंधी जोखिम तथा मांसपेशियों की समस्या भी उत्पन्न हो सकती है। नींद पर भी इसका प्रतिकूल असर पड़ता है और बच्चों की पढ़ाई प्रभावित होती है।

विशेषज्ञ ने अभिभावकों को सलाह दी है कि बच्चों का स्क्रीन टाइम सीमित रखें, उनके साथ गुणवत्तापूर्ण समय बिताएं और संवाद बढ़ाएं। साथ ही माता-पिता स्वयं भी बच्चों के सामने मोबाइल का सीमित उपयोग करें। उन्होंने कहा कि 'वर्चुअल ऑटिज्म' जैसी समस्या को स्क्रीन टाइम कम कर तथा सामाजिक सहभागिता बढ़ाकर नियंत्रित किया जा सकता है।

हिंदी हिन्दुस्तान की स्वीकृति से एचटीडीएस कॉन्टेंट सर्विसेज़ द्वारा प्रकाशित