नयी दिल्ली , फरवरी 10 -- ध्रुपद गायक फ़ैयाज़ वासिफ़ुद्दीन डागर ने फिल्म 'पोन्नियिन सेल्वन II' के गीत "वीरा राजा वीरा" को लेकर चल रहे कॉपीराइट विवाद में दिल्ली उच्च न्यायालय के सितंबर 2025 के फैसले को उच्चतम न्यायालय में चुनौती दी है। उच्चतम न्यायालय इस मामले की अगली सुनवाई 13 फरवरी को करेगा।

मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति एन.वी. अंजारिया की पीठ ने मंगलवार को मामले को शुक्रवार तक के लिए स्थगित कर दिया।

श्री डागर ने दिल्ली उच्च न्यायालय की डिवीजन बेंच के उस फैसले को चुनौती दी है, जिसमें एकल पीठ द्वारा दिए गए अंतरिम राहत आदेश को पलट दिया गया था।

श्री डागर की याचिका में कहा गया है कि "वीरा राजा वीरा" उनके दिवंगत पिता नासिर फ़ैयाज़ुद्दीन डागर और चाचा ज़हीरुद्दीन डागर द्वारा रचित ध्रुपद संरचना "शिव स्तुति" से काफी हद तक मेल खाता है। याचिका के अनुसार, फिल्मी गीत के बोल भले अलग हों, लेकिन उसकी ताल, लय और संगीत संरचना 'शिव स्तुति' के समान है, जिसे जूनियर डागर ब्रदर्स ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रस्तुत किया था और पैन रिकॉर्ड्स द्वारा व्यावसायिक रूप से जारी किया गया था।

वहीं ए.आर. रहमान ने आरोपों से इनकार करते हुए कहा कि 'शिव स्तुति' पारंपरिक ध्रुपद रचना है, जो सार्वजनिक डोमेन में आती है। उनका कहना है कि "वीरा राजा वीरा" एक मौलिक रचना है, जो पश्चिमी संगीत की बुनियाद पर आधारित है और इसमें 227 अलग-अलग संगीत परतें हैं, जो पारंपरिक हिंदुस्तानी शास्त्रीय ढांचे से भिन्न हैं।

सिंगल जज ने अप्रैल 2025 में प्रथमदृष्टया कॉपीराइट उल्लंघन का मामला मानते हुए गीत में फ़ैयाज़ुद्दीन डागर और ज़हीरुद्दीन डागर (जूनियर डागर ब्रदर्स) को संगीतकार के रूप में श्रेय देने का निर्देश दिया था। साथ ही ए.आर. रहमान और निर्माताओं को 2 करोड़ रुपये हाईकोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल के पास जमा करने का आदेश भी दिया गया था।

उच्चतम न्यायालय में दायर याचिका में श्री डागर ने तर्क दिया है कि डिवीजन बेंच ने अपीलीय अधिकारों की सीमाओं से आगे बढ़कर सिंगल जज के अंतरिम आदेश को पलटा। उन्होंने कहा कि भारतीय कॉपीराइट कानून में संगीत की लिखित नोटेशन अनिवार्य नहीं है और ध्वनि रिकॉर्डिंग के माध्यम से भी लेखकीय अधिकार स्थापित किए जा सकते हैं। उन्होंने 1978 के एम्स्टर्डम प्रदर्शन की रिकॉर्डिंग और उसके व्यावसायिक प्रकाशन को 'फिक्सेशन' का वैध प्रमाण बताया है।

याचिका में कॉपीराइट अधिनियम की धारा 55(2) और 57 (नैतिक अधिकार) की व्याख्या पर भी सवाल उठाए गए हैं। श्री डागर का कहना है कि कॉपीराइट संरक्षण के लिए रचना का नया या अभिनव होना आवश्यक नहीं, बल्कि यह पर्याप्त है कि वह लेखक की मौलिक कृति हो और किसी से नकल न की गई हो। अब यह मामला 13 फरवरी को उच्चतम न्यायालय में आगे की सुनवाई के लिए सूचीबद्ध है।

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