परमिंदर संधू सेनयी दिल्ली , मार्च 12 -- सिंगापुर के पूर्व विदेश मंत्री जॉर्ज यो योंग-बून ने कहा है कि एशिया में स्थिरता एवं विकास के लिए भारत और चीन के बीच मजबूत तथा स्थिर संबंध अत्यंत महत्वपूर्ण हैं।

उन्होंने राष्ट्रीय राजधानी में आयोजित 10वें सिनर्जिया सम्मेलन में हिस्सा लेते हुए कहा है कि भारत और चीन के संबंधों को स्वाभाविक रूप से विरोधी नहीं माना जाना चाहिए, भले ही दोनों देशों के बीच सीमा विवाद मौजूद हो। उन्होंने कहा कि सीमा विवाद की जड़ ब्रिटिश शासन और छिंग राजवंश के बीच सीमा निर्धारण न होने में निहित है और इस मुद्दे का समाधान अंततः संवाद के माध्यम से संभव है। श्री यो ने कहा कि लद्दाख, उच्च हिमालयी क्षेत्र और अरुणाचल प्रदेश से जुड़े सीमाई मुद्दों पर बातचीत के जरिए अंततः समाधान निकलेगा, जैसा कि भारत ने बंगलादेश के साथ और चीन ने रूस के साथ अपने सीमा विवादों का समाधान किया है।

उन्होंने कहा कि इतिहास में भारत और चीन के बीच स्वाभाविक शत्रुता नहीं रही है और यदि दोनों देशों के संबंध मजबूत होते हैं तो एशिया में शांति और स्थिरता को मजबूती मिलेगी। श्री यो के अनुसार भारत और चीन के बीच सामान्य और स्थिर संबंध दक्षिण-पूर्व एशिया की सुरक्षा और समृद्धि के लिए भी महत्वपूर्ण हैं। उन्होंने कहा कि यदि दोनों देशों के बीच टकराव होता है तो पूरे क्षेत्र में अस्थिरता पैदा हो सकती है।

उन्होंने कहा कि दोनों देशों के बीच ऐतिहासिक और सांस्कृतिक संबंध गहरे रहे हैं और भारत से ही बौद्ध धर्म चीन पहुंचा था। हालांकि उन्होंने इस बात पर खेद जताया कि दोनों देशों के समाजों के बीच एक-दूसरे के बारे में जानकारी अब भी सीमित है।

श्री यो ने कहा कि वर्ष 2050 तक चीन दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन सकता है और भारत दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन सकता है। उन्होंने कहा कि दोनों देश मिलकर विश्व की लगभग 40 प्रतिशत आबादी का प्रतिनिधित्व करते हैं।

उन्होंने भारत को सलाह दी कि वह भू-राजनीतिक प्रतिस्पर्धा में उलझने के बजाय आर्थिक विकास पर ध्यान केंद्रित करे और भारत-चीन संबंधों को मजबूत बनाए। श्री यो ने कहा कि यदि दोनों देशों के संबंध मजबूत होते हैं तो इससे दक्षिण-पूर्व एशिया, मध्य एशिया और पश्चिम एशिया जैसे क्षेत्रों में स्थिरता और विकास को भी बढ़ावा मिल सकता है।

ताइवान जलडमरूमध्य की स्थिति का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि पूर्वी एशिया में भू-राजनीतिक प्रतिस्पर्धा के बावजूद स्थिति फिलहाल स्थिर है, हालांकि किसी भी टकराव की स्थिति में वैश्विक तकनीकी आपूर्ति शृंखलाओं पर गंभीर प्रभाव पड़ सकता है। उन्होंने चेतावनी दी कि ताइवान को लेकर किसी संघर्ष की स्थिति में अर्धचालक उद्योग को बड़ा झटका लग सकता है, जिससे वैश्विक प्रौद्योगिकी क्षेत्र प्रभावित होगा।

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