चेन्नई , दिसंबर 06 -- उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीशों ने शनिवार को यहां राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) दक्षिणी जोन पीठ और दक्षिणी राज्यों के प्रदूषण नियंत्रण बोर्डों के क्षेत्रीय पर्यावरण सम्मेलन-2025 में 'सहकारी पारिस्थितिक संघवाद' तथा पारंपरिक ज्ञान अपनाने की जोरदार वकालत की।
दो दिवसीय इस सम्मेलन का उद्घाटन उच्चतम न्यायालय के न्यायमूर्ति एम.एम. सुंदरेश ने शनिवार को किया। अपने संबोधन में न्यायमूर्ति सुंदरेश ने कहा कि परंपरा की ओर लौटने से दुनिया बेहतर हो सकती है। उन्होंने रंग उद्योग के प्रदूषण से प्रभावित समुदायों की अपनी व्यक्तिगत यात्रा का जिक्र करते हुए कहा, "जब पर्यावरण प्रभावित होता है, तो पूरी दुनिया प्रभावित होती है।" उन्होंने तटीय क्षेत्रों की सुरक्षा को अत्यंत महत्वपूर्ण बताया।
उच्चतम न्यायालय के न्यायमूर्ति अरविंद कुमार ने "कागज पर कानून और जमीन पर जिंदगी" के बीच भारी अंतर की ओर इशारा किया और दक्षिणी राज्यों के बीच "सहकारी पारिस्थितिक संघवाद" की अवधारणा प्रस्तावित की। उन्होंने यह भी सुझाव दिया कि यह सम्मेलन "दक्षिणी पर्यावरण समझौते" की शुरुआत बन सकता है।
मद्रास उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायमूर्ति मनिंद्र मोहन श्रीवास्तव ने विश्व वन्यजीव कोष (डब्ल्यूडब्ल्यूएफ) की रिपोर्ट का हवाला देते हुए स्तनधारी, पक्षी, मछली, सरीसृप और उभयचर प्रजातियों की वैश्विक आबादी में लगभग 69 प्रतिशत की भयावह गिरावट पर गहरी चिंता जताई। उन्होंने कहा कि केवल अदालतों द्वारा सुधारात्मक उपाय करने के बजाय मानव को ही लुप्तप्राय प्रजाति बनने से रोकने के लिए निवारक कदम उठाने की जरूरत है।
उद्घाटन सत्र की अध्यक्षता राष्ट्रीय हरित अधिकरण के अध्यक्ष न्यायमूर्ति प्रकाश श्रीवास्तव ने की। इस मौके पर तमिलनाडु के वित्त मंत्री थंगम थेन्नारसु और महाधिवक्ता पी.एस. रमन उपस्थित थे। श्री रमन ने ह्यूबर्ट रीव्स के प्रसिद्ध कथन का उल्लेख करते हुए मानव की मूर्खता और सतत विकास के महत्व पर जोर दिया।
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