नयी दिल्ली , जनवरी 03 -- त्रिपुरा के छात्र एंजेल चकमा की देहरादून में क्षेत्रीय टिप्पणियां किये जाने के बाद हत्या के मामले से 10 वर्ष पुरानी एक समिति की रिपोर्ट और उसकी सिफारिशों को फिर सुर्खियों में ला दिया है, जिसे सरकारें पूरी तरह से लागू नहीं कर सकी हैं।
वर्ष 2014 में, दिल्ली में निडो तनियम हत्या मामले के बाद, गृह मंत्रालय ने भारतीय प्रशासनिक सेवा के सेवानिवृत्त अधिकारी एम पी बेजबरुआ की अध्यक्षता में समिति गठित की थी। यह समिति मेट्रो और अन्य शहरों में पूर्वोत्तर क्षेत्र के लोगों के समक्ष पेश होने वाली समस्याओं, भेदभाव और हिंसा की जांच करने तथा नस्लीय भेदभाव को समाप्त करने के लिए उपाय सुझाने के लिए बनायी गयी थी।
बेजबरुआ समिति ने हालांकि एक व्यापक रिपोर्ट सौंपी थी, और गृह मंत्रालय ने सिफारिशों को लागू करने के लिए एक निगरानी समिति गठित की है, जो अभी भी सक्रिय है, लेकिन इस पर अब तक कार्यान्वयन केवल छिटपुट ही हुआ है।
श्री एम पी बेजबारुआ ने यूनीवार्ता से फोन पर बातचीत में कहा, " हमने कई शहरों में बड़े पैमाने पर लोगों से बातचीत के बाद बहुत सारी सिफारिशें दीं। सिफारिशें निवारक और दंडात्मक दोनों प्रकृति की थीं। "श्री बेजबारुआ ने कहा, " देश के पूर्वोत्तर क्षेत्र के अन्य क्षेत्रों से अलग होने के कारण शिक्षा, काम आदि के लिए अन्य मेट्रो में जाने वाले विद्यार्थियों और लोगों को 'नस्लीय प्रकृति की बहुत सारे अप्रिय अनुभव' होते हैं, और इसलिए रिपोर्ट का मुख्य विषय लोगों को 'जोड़ने' का था।
सिफारिशों के कार्यान्वयन के बारे में पूछे जाने पर श्री बेजबरुआ ने कहा कि राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में कुछ कदम उठाये गये हैं, जैसे समर्पित हेल्पलाइन नंबर- 1093- पूर्वोत्तर छात्रों के लिए एक समर्पित हॉस्टल, लेकिन देश के अन्य हिस्सों में ज्यादा कुछ नहीं किया गया है।
रिपोर्ट की एक प्रमुख सिफारिश थी कि कुछ क्षेत्रों के लोगों के साथ होने वाली आपत्तिजनक घटनाओं से निपटने के लिए आईपीसी और सीआरपीसी में एक विशेष प्रावधान शामिल किया जाये।
इन कानूनों को हालांकि 2024 में तीन नये कानूनों -बीएनएस, बीएनएसएस और बीएसए-में संशोधन करने के समय भी इस महत्वपूर्ण सिफारिश को नजरअंदाज कर दिया गया।
मौजूदा आईपीसी 153 (ए) और (बी) प्रावधानों को 'नस्लीय भेदभाव और दुर्व्यवहार' के चरम मामलों से निपटने के लिए पर्याप्त नहीं समझते हुए, निगरानी समिति ने भी संशोधन के समय गृह मंत्रालय को प्रतिनिधित्व दिया था कि कानून को अधिक कड़ा बनाने के लिए एक नया प्रावधान 153 (सी) शामिल किया जाये।
एक निगरानी समिति सदस्य ने हालांकि कहा कि विधायकों ने उस सिफारिश को नजरअंदाज कर दिया। बेजबरुआ समिति की सिफारिशों को लागू करने के लिए गठित निगरानी समिति की सदस्य रहीं सुश्री अलाना गोलमेई ने कहा, " हमने पूर्वोत्तर के लोगों के लिए अलग कानून नहीं मांगा था।"उन्होंने कहा कि विभिन्न क्षेत्रों के लोग जब पढ़ाई या रोजगार के लिए अन्य जगहों पर जाते हैं, तो समान भेदभाव का सामना करते हैं। उन्होंने कहा कि निगरानी समिति पिछले नौ सालों में मुश्किल से 15 बार मिली है।
पूर्वोत्तर के लिए समर्पित हॉस्टल, बहु-सांस्कृतिक केंद्र आदि की अन्य सिफारिशें अभी भी प्रगति पर हैं। पूर्वोत्तर विद्यार्थियों के लिए दो हॉस्टलों में से पहला, बराक हॉस्टल, अप्रैल 2025 में जेएनयू में खोला गया, लेकिन अन्य क्षेत्रों के विद्यार्थियों को भी हॉस्टल में जगह दिये जाने पर विरोध हुआ। द्वारका दिल्ली में प्रस्तावित बहु-सांस्कृतिक केंद्र अभी भी प्रगति पर है।
श्री बेजबरुआ ने कहा, " हमने सभी राज्यों की पुलिस को पूर्वोत्तर के लोगों के साथ होने वाले नस्लीय भेदभाव संबंधी मुद्दों पर संवेदीकरण करने के लिए कहा था। लेकिन उन्होंने अफसोस जताया कि हाल ही में हुई देहरादून घटना की गहरायी से जांच की जाये, तो अभी भी यह बहुत दूर की कौड़ी है। "उन्होंने कहा कि समिति ने एनसीईआरटी पाठ्यक्रम में उत्तर-पूर्व-उसके परिदृश्य, लोगों, संस्कृति और नायकों के बारे में समर्पित अध्याय शामिल करने कीभी सिफारिश की थी, ताकि बच्चों में क्षेत्र के बारे में जागरूकता पैदा हो। उस मोर्चे पर भी प्रगति असमान रही है।
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