शिमला , जनवरी 07 -- हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय ने शिमला नगर निगम के कार्यकाल को ढाई साल से बढ़ाकर पांच साल करने को चुनौती देने वाली एक जनहित याचिका (पीआईएल) में अपना जवाब दाखिल न करने पर राज्य सरकार पर पचास हजार रुपये का जुर्माना लगाया है।
मुख्य न्यायाधीश गुरमीत सिंह संधवालिया और न्यायमूर्ति जिया लाल भारद्वाज की खंडपीठ ने यह आदेश बुधवार को पारित किया, जिन्होंने मामले की गंभीरता के बावजूद राज्य द्वारा निरंतर अनुपालन न किए जाने का कड़ा संज्ञान लिया। याचिका में तर्क दिया है कि कार्यकाल का यह विस्तार नगर निगम अधिनियम का उल्लंघन है।
न्यायालय ने गौर किया कि राज्य सरकार के जवाब पर अभी आपत्तियां है और इन आपत्तियों को अभी भी दूर नहीं किया गया है, जबकि याचिकाकर्ता ने प्रत्युत्तर दाखिल करके अपनी दलीलें पहले ही पूरी कर ली हैं। पीठ ने राज्य सरकार को दो दिनों के भीतर आपत्तियां दूर करने और जवाब फिर से दाखिल करने का निर्देश दिया।
यह जनहित याचिका अंजलि सोनी की ओर से दायर की गई है, जिसमें एक अध्यादेश के माध्यम से शिमला नगर निगम के महापौर और उप-महापौर के कार्यकाल को बढ़ाने के राज्य सरकार के फैसले को चुनौती दी गई है। मामले को 24 फरवरी तक के लिए स्थगित कर दिया गया है, क्योंकि याचिकाकर्ता और कुछ प्रतिवादियों के वकील 8 और 9 जनवरी को उपलब्ध नहीं थे।
याचिकाकर्ता की ओर से पेश वरिष्ठ वकील सुधीर ठाकुर ने यूनीवार्ता से कहा कि कार्यकाल बढ़ाने वाला अध्यादेश पहले ही समाप्त हो चुका है और राज्य सरकार इसे बदलने के लिए नियमित संशोधन लागू करने में विफल रही है। उन्होंने बताया कि राज्यपाल ने प्रस्तावित संशोधन पर हस्ताक्षर नहीं किए, जिससे यह विस्तार कानूनी रूप से अमान्य हो गया।
श्री ठाकुर ने कृष्णा कुमार बनाम राज्य मामले में उच्चतम न्यायालय के फैसले का हवाला देते हुए कहा कि एक बार जब अध्यादेश समाप्त हो जाता है और उसे नियमित अधिनियम द्वारा प्रतिस्थापित नहीं किया जाता है, तो सरकार उसी विषय पर नया अध्यादेश नहीं ला सकती है। उन्होंने तर्क दिया कि वैधानिक समर्थन के बिना विस्तारित कार्यकाल का जारी रहना असंवैधानिक है।
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