चेन्नई , जनवरी 9 -- मद्रास उच्च न्यायालय ने न्यायमूर्ति सुश्री आशा की एकल पीठ द्वारा अभिनेता-राजनेता विजय की फिल्म 'जन नायकन' के लिए केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड (सीबीएफसी) को सेंसर प्रमाणपत्र जारी करने का निर्देश दिये जाने के कुछ घंटे बाद ही इस पर रोक लगा दी।
न्यायमूर्ति सुश्री आशा की एकल पीठ ने अभिनेता-राजनेता विजय की आखिरी फिल्म 'जन नायकन' के लिए केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड (सीबीएफसी) को सेंसर प्रमाणपत्र तुरंत जारी करने का निर्देश दिया था। इसके कुछ घंटे भी नहीं बीते थे कि शुक्रवार को ही अपने आदेश पर रोक लगा दी। मामले की अगली सुनवाई के लिए 21 जनवरी को होगी।
इसका सीधा अर्थ यह हुआ कि आज 9 जनवरी को विश्वव्यापी रिलीज होने वाली यह फिल्म, जो प्रमाणपत्र हासिल करने में देरी के कारण स्थगित कर दी गयी थी, अब अगले सप्ताह पोंगल पर्व के मौके पर भी पर्दे पर नहीं आयेगी।
सीबीएफसी के एकल न्यायाधीश के आदेश को चुनौती देते हुए दायर की गयी तत्काल अपील पर मुख्य न्यायाधीश एम एम श्रीवास्तव और न्यायाधीश जी अरुल मुरुगन की प्रथम पीठ ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद प्रोडक्शन यूनिट को भी जवाब दाखिल करने का नोटिस दिया। सेंसर बोर्ड की तरफ से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता वीडियो-कॉन्फ्रेंसिंग के जरिये पेश हुए।
अदालत में आने की जल्दबाजी पर सवाल उठाते हुए प्रथम पीठ ने कहा कि सेंसर बोर्ड को अपना जवाब दाखिल करने के लिए पर्याप्त समय दिया जाना चाहिए था। आदेश के लिए उन पर दबाव नहीं बनाया जा सकता। पीठ ने टिप्पणी की कि चूंकि सेंसर प्रमाणन की प्रक्रिया में कई चरणों का पालन करना पड़ता है, इसलिए इसे प्राप्त करने के लिए धैर्य रखना जरूरी है। इसके साथ ही, न्यायालय ने उन निर्माताओं पर भी सवाल उठाये, जो सेंसर बोर्ड की मंजूरी मिलने से पहले ही फिल्म के प्रदर्शन की तारीख तय कर देते हैं और फिर आखिरी समय में अदालत का दरवाजा खटखटाते हैं।
बोर्ड ने हालांकि पहले फिल्म को यू/ए प्रमाणपत्र दे दिया था, लेकिन बाद में इसे एक समीक्षा समिति के पास भेज दिया, क्योंकि ऐसा कहा गया था कि फिल्म में सेना सहित कुछ अन्य विषयों पर विवादास्पद या आलोचनात्मक संदर्भ हैं।
उच्च न्यायालय के रोक लगाये जाने के बाद 'जन नायकन' की रिलीज पर लगा प्रतिबंध जारी है और जब तक पीठ का अंतिम आदेश नहीं आता, तब तक फिल्म सिनेमाघरों में नहीं लग पायेगी। वर्तमान में रोक लागू होने के कारण 'जन नायकन' तब तक रिलीज नहीं हो सकती, जब तक कि सेंसर बोर्ड इसे अपनी मंजूरी नहीं दे देता।
अदालत ने यह स्पष्ट कर दिया कि सिनेमैटोग्राफ अधिनियम के तहत वैधानिक प्रक्रियाओं का पूरी तरह से पालन किया जाना चाहिए और न्यायिक हस्तक्षेप सेंसर बोर्ड के अधिकारों का अतिक्रमण नहीं कर सकता। यह पूरा विवाद फिल्म 'जन नायकन' को सेंसर सर्टिफिकेट मिलने में हो रही देरी को लेकर है। इस फिल्म को राजनीतिक संदेशों से भरपूर बताया जा रहा है, जो अभिनेता विजय की अपनी राजनीतिक पार्टी 'तमिलगा वेत्री कझगम' (टीवीके) बनाने के बाद उनके चुनावी पदार्पण के समय के साथ मेल खाती है।
निर्माताओं ने मद्रास उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाते हुए आरोप लगाया था कि सेंसर बोर्ड फिल्म की जांच में अत्यधिक देरी कर रहा है और जानबूझकर निशाना बना रहा है। उन्होंने दलील दी कि फिल्म पहले ही सभी आवश्यक मानदंडों का पालन कर चुकी है और प्रमाणन में देरी करना रचनात्मक अभिव्यक्ति पर एक तरह का परोक्ष प्रतिबंध है।
न्यायाधीश सुश्री आशा ने अपने आदेश में ऐसे निर्देश जारी किये थे, जिन्हें फिल्म की रिलीज को आसान बनाने वाला माना गया, जिस पर सेंसर बोर्ड ने आपत्ति जतायी। सेंसर बोर्ड का तर्क था कि यह आदेश उनकी वैधानिक शक्तियों को कमजोर करता है और अदालतों को प्रमाणन प्रक्रिया को दरकिनार करने की अनुमति देकर एक गलत मिसाल कायम करता है।
न्यायाधीश सुश्री आशा के आदेश को चुनौती देते हुए सेंसर बोर्ड ने मुख्य न्यायाधीश की पीठ का रुख किया। बोर्ड ने जोर देकर कहा कि फिल्म का प्रमाणन एक विशेष वैधानिक कार्य है, जो पूरी तरह से केवल बोर्ड को सौंपा गया है।
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