नयी दिल्ली , जनवरी 08 -- उच्चतम न्यायालय ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति यशवंत वर्मा की ओर से दायर उस रिट याचिका पर अपना फैसला सुरक्षित रख लिया है, जिसमें उन्होंने (अपने) महाभियोग से संबंधित जांच समिति के गठन के फैसले को चुनौती दी है।

गौरतलब है कि श्री वर्मा के आधिकारिक आवास से बेहिसाब नकदी बरामद होने के बाद लोकसभा में शुरू की गयी महाभियोग की कार्यवाही के संबंध में लोकसभा अध्यक्ष ने न्यायाधीश जांच अधिनियम, 1968 के तहत एक जांच समिति गठित करने की अनुमति दी है।

न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता और न्यायमूर्ति सतीश चंद्र शर्मा की पीठ ने इस मामले की सुनवाई गुरुवार को की।

न्यायमूर्ति वर्मा का मुख्य तर्क यह है कि महाभियोग प्रस्ताव लोकसभा और राज्यसभा दोनों में एक ही दिन, 21 जुलाई को पेश किए गए थे, लेकिन लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने प्रस्ताव की स्वीकृति पर राज्यसभा सभापति के निर्णय की प्रतीक्षा किए बिना या अनिवार्य संयुक्त परामर्श किए बिना एकतरफा रूप से जांच समिति का गठन किया।

याचिका में तर्क दिया गया है कि यह कार्रवाई न्यायाधीश (जांच) अधिनियम, 1968 की धारा 3(2) का उल्लंघन करती है। धारा 3(2) का प्रावधान यह निर्धारित करता है कि जहां दोनों सदनों में एक ही दिन महाभियोग के नोटिस दिए जाते हैं, वहां कोई भी समिति तब तक गठित नहीं की जाएगी जब तक कि प्रस्ताव दोनों सदनों में स्वीकार न कर लिया जाए। यदि स्वीकार कर लिया जाता है, तो समिति का गठन लोकसभा अध्यक्ष और राज्यसभा के सभापति द्वारा संयुक्त रूप से किया जाना चाहिए।

सुनवाई के दौरान, न्यायालय को सूचित किया गया कि राज्यसभा के उप-सभापति ने 11 अगस्त को महाभियोग प्रस्ताव को खारिज कर दिया था, जिसके बाद लोकसभा अध्यक्ष ने 12 अगस्त को जांच समिति का गठन किया।

याचिकाकर्ता का तर्क है कि उप-सभापति के पास प्रस्ताव को खारिज करने का अधिकार नहीं था। इसलिए लोकसभा अध्यक्ष इस आधार पर आगे नहीं बढ़ सकते थे कि राज्यसभा का प्रस्ताव खारिज कर दिया गया है।

एक अन्य मुद्दा यह उठाया गया कि क्या राज्यसभा के तत्कालीन सभापति जगदीप धनखड़ ने पहले ही दिन प्रस्ताव स्वीकार कर लिया था। यदि ऐसा था, तो श्री धनखड़ के इस्तीफे के बाद पदभार ग्रहण करने वाले उप-सभापति बाद में प्रस्ताव को खारिज नहीं कर सकते थे। ऐसी स्थिति में जांच समिति (यदि कोई हो) लोकसभा अध्यक्ष और राज्यसभा सभापति द्वारा संयुक्त रूप से गठित की जानी चाहिए थी।

न्यायमूर्ति वर्मा की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता सिद्धार्थ लूथरा ने तर्क दिया कि संविधान का अनुच्छेद 124 न्यायाधीशों की महाभियोग कार्यवाही के लिए एक पूर्ण संहिता प्रदान करता है। उन्होंने कहा कि संविधान का अनुच्छेद 91 राज्यसभा के उप-सभापति को सभापति की अनुपस्थिति में उनके कर्तव्यों का पालन करने की अनुमति देता है, लेकिन इसे अनुच्छेद 124(5) के तहत बनाए गए न्यायाधीश (जांच) अधिनियम के तहत विवेकाधीन शक्तियों के लिए लागू नहीं किया जा सकता है। ये शक्तियां केवल सभापति को ही प्राप्त हैं।

वरिष्ठ अधिवक्ता मुकुल रोहतगी ने इन दलीलों को दोहराते हुए कहा कि यह मामला नए सभापति की नियुक्ति तक प्रतीक्षा कर सकता था। हालांकि, पीठ ने इस तर्क पर आपत्ति जताई। न्यायमूर्ति दत्ता ने सवाल किया कि यदि राष्ट्रपति की अनुपस्थिति में उपराष्ट्रपति उनके कार्यों का निर्वहन कर सकते हैं, तो क्या उप-सभापति इसी तरह राज्यसभा के सभापति के कार्यों का निर्वहन नहीं कर सकते? श्री रोहतगी ने जवाब दिया कि जहां संविधान स्पष्ट रूप से कुछ मामलों में ऐसे विकल्प प्रदान करता है, वहीं न्यायाधीश (जांच) अधिनियम ऐसा नहीं करता है।

श्री रोहतगी ने तर्क दिया कि अधिनियम केवल लोकसभा अध्यक्ष और राज्यसभा सभापति का संदर्भ देता है और यह प्रावधान नहीं करता है कि 'सभापति' शब्द में उप-सभापति शामिल होगा। न्यायमूर्ति दत्ता ने कहा कि अधिनियम के परिभाषा खंडों में 'जब तक कि संदर्भ से अन्यथा आवश्यक न हो' अभिव्यक्ति का भी उपयोग किया गया है।

लोकसभा अध्यक्ष कार्यालय की ओर से पेश भारत के सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने तर्क दिया कि धारा 3(2) के प्रावधान का उद्देश्य ऐसी स्थिति को रोकना था, जहां संसद के दोनों सदनों द्वारा दो अलग-अलग जांच समितियां गठित की जाएं।

गौरतलब है कि जुलाई में, लोकसभा के 145 सदस्यों और राज्यसभा के 63 सदस्यों की ओर से महाभियोग नोटिस क्रमशः लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला और तत्कालीन राज्यसभा सभापति जगदीप धनखड़ को सौंपे गए थे। अगस्त में लोकसभा अध्यक्ष ने जांच समिति के गठन की घोषणा की जिसमें उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश अरविंद कुमार, मद्रास उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश एम.एम. श्रीवास्तव और कर्नाटक उच्च न्यायालय के वरिष्ठ अधिवक्ता वासुदेव आचार्य शामिल हैं।

यह पूरा विवाद 14 मार्च से शुरू हुआ, जब एक 'अग्निशमन अभियान' के दौरान जस्टिस वर्मा के आधिकारिक निवास के एक आउटहाउस में कथित तौर पर बड़ी मात्रा में जले हुए नोट बरामद किए गए थे। जनता के आक्रोश के बाद, तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश संजीव खन्ना ने एक 'इन-हाउस जांच समिति' का गठन किया था।

इसके बाद न्यायमूर्ति वर्मा को इलाहाबाद उच्च न्यायालय में वापस भेज दिया गया और जांच लंबित रहने तक उनसे न्यायिक कार्य वापस ले लिया गया।

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