बेंगलुरु , दिसंबर 15 -- जिस दौर में कंप्यूटर की मदद से धुनें बनायी जा रही हैं और रातों रात रुझान बदल रहे हैं, उसे लेकर विश्व विख्यात संगीतकार इलैयाराजा को अडिग विश्वास है कि संगीत भीतर से पैदा होता है और मशीनें उन्हें तैयार नहीं कर सकतीं।
अक्षय पात्र फाउंडेशन की ओर से आयोजित 'म्यूजिक फॉर मिल्स चैरिटी कन्सर्ट' से पहले यूनीवार्ता से बात करते हुए महान संगीतकार ने कृत्रिम बुद्धिमत्ता और रचनात्मकता पर खुलकर बात रखी। उन्होंने इस डर को सिरे से खारिज कर दिया कि तकनीक कभी भी मानव अभिव्यक्ति की जगह ले सकती है।
इलैयाराजा ने कहा कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता पहले से मौजूद चीजों को फिर से व्यवस्थित कर सकती है, जबकि संगीत जिंदगी का कुदरती तजुर्बा, अहसास और भीतरी जागरूकता है। इलैयाराजा के लिए रचनात्मकता उत्पाद नहीं, बल्कि एक ऐसी प्रक्रिया है, जो सहजता से बहती है। ठीक वैसे ही जैसे मौन ध्वनि में बदल जाती है।
वह कहते हैं, "इंसानी योग्यता और कृत्रिम बुद्धिमत्ता अलग नहीं हैं। जिसे कृत्रिम कहते हैं वह कुछ ऐसा है, जो हमने सीखा है और हासिल किया है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता महज उन्हीं चीजों पर काम करती है, जो पहले से बने हैं और हमें दूसरों ने दिखाई हैं। वह मौलिक रूप से कुछ नहीं बनाती।"उन्होंने आगे कहा, "संगीत मुझ तक कुदरती तौर पर आया। यह ठीक वैसा ही है, जैसे हमारे नाम हमें माता-पिता द्वारा दिए जाते हैं। हर चीजें किसी न किसी तौर पर हासिल की जाती है। इसलिए कृत्रिम बुद्धिमत्ता हमारे बाहर नहीं है। यह पहले से ही हमारे भीतर है।"इलैयाराजा ने कर्नाटक शास्त्रीय परंपराओं से लिपटी 'दुर्गा' और 'हंसध्वनी' जैसे रागों पर आधारित ध्यान संगीत के बारे में बात की, जिन्हें उन्होंने सुकून देने वाला और निदानकारी बताया।
उन्होंने समझाया कि सच्चा ध्यान, विश्लेषण या प्रश्न पूछने से नहीं, बल्कि शांति और शून्यता से पैदा होता है। एक ऐसी जगह जहां संगीत सहज रूप से पहुंचता है। इलैयाराजा का मानना है कि संगीत की यह खासियत सीधे रूह तक पहुंचने की काबिलियत देता है।
यह सोच उनके 'म्यूजिक फॉर मिल्स' से जुड़ाव को भी समझाता है, जो अक्षय पात्र फाउंडेशन का समर्थन करने वाला एक चैरिटी कन्सर्ट है। इलैयाराजा ने कहा कि जैसे ही उनके सामने यह प्रस्ताव आया, उन्होंने इसमें भाग लेने की सहमति दे दी। उन्होंने कहा, "जब संगीत पूर्णता के साथ बनाया जाता है, तो वह सहज रूप से ऊंचे मकसद की तलाश करता है। कला को सेवा के साथ जोड़ना मेरे लिए कोई बयान नहीं, बल्कि सहज प्रवृत्ति है।"फिल्म संगीत में पांच दशक पूरा करने के बावजूद संगीत दिग्ग्ज ने पीछे मुड़कर देखने या सलाह देने में कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई। जब उनसे पूछा गया कि वे तेजी से बदल रहे और रुझानों से प्रभावित हो रहे उद्योग में युवा रचनाकारों को क्या मार्गदर्शन देंगे, तो उन्होंने मुस्कुरा कर कहा कि आज के संगीतकार योग्य हैं और अपने रास्ते खुद ढूंढ़ने के काबिल हैं। संगीत आखिरकार श्रोताओं का होता है। अगर वह गूंजता है तो रहता है, नहीं तो धूमिल हो जाता है।
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