इटावा , फरवरी 5 -- इटावा के फिशर वन क्षेत्र में स्थित शमसुद्दीन की मजार को लेकर भूमि विवाद का मामला अब प्रभागीय निदेशक सामाजिक वानिकी की अदालत में पहुंच गया है।

गुरुवार को हुई सुनवाई के दौरान वन विभाग और मजार के केयरटेकर पक्ष ने अपने-अपने तर्क रखे। अदालत ने केयरटेकर पक्ष को भूमि संबंधी दस्तावेज प्रस्तुत करने के लिए 10 दिन का समय दिया है। मामले की अगली सुनवाई 16 फरवरी को होगी।

वन विभाग का कहना है कि संबंधित मजार वन भूमि पर स्थित है और वन अधिनियम 1927 की धारा 61 के तहत बेदखली की कार्रवाई शुरू की गई है। विभाग की ओर से केयरटेकर फजले इलाही सहित अन्य संबंधित लोगों को नोटिस जारी कर जमीन के स्वामित्व से जुड़े दस्तावेज मांगे गए थे। विभागीय अधिकारियों का दावा है कि राजस्व अभिलेखों में उक्त भूमि वन विभाग के नाम दर्ज है और अल्पसंख्यक विभाग ने भी इसे वक्फ संपत्ति नहीं माना है।

वहीं केयरटेकर फजले इलाही के अधिवक्ता नदीम अहमद ने अदालत में कहा कि मजार पर वर्ष 1953-54 से उर्स का आयोजन होता रहा है और उनके मुवक्किल लंबे समय से इसकी देखरेख करते आ रहे हैं। उन्होंने मजार के प्राचीन होने का दावा करते हुए ऐतिहासिक संदर्भों और एक पुरानी पुस्तक का हवाला भी दिया। उनका कहना है कि यदि वन विभाग भूमि पर दावा कर रहा है तो उसे भी अपने अभिलेख स्पष्ट रूप से प्रस्तुत करने चाहिए।

सुनवाई के दौरान एक अन्य पक्ष की ओर से भी मजार की देखरेख को लेकर दावा पेश किया गया, जिससे मामला और जटिल हो गया है। संबंधित पक्षों ने आरोप लगाया कि मजार तक जाने का रास्ता बाधित किया गया है, जिससे श्रद्धालुओं को परेशानी हो रही है। वहीं वन विभाग ने किसी भी अवैध निर्माण या अतिक्रमण पर नियमानुसार कार्रवाई की बात दोहराई है। मामले को लेकर क्षेत्र में चर्चा का माहौल है और अब सभी की निगाहें 16 फरवरी को होने वाली अगली सुनवाई पर टिकी हैं।

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