नयी दिल्ली , जनवरी 29 -- संसद में गुरुवार को पेश वित्त वर्ष 2025-26 के आर्थिक सर्वेक्षण में सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के अनुपात में राजकोषीय घाटा और उधारी कम करने के केंद्र सरकार के प्रयासों की सराहना की गयी है जबकि राज्यों के ऋण और घाटे के हालिया स्तर पर चिंता जतायी गयी है।
मुख्य आर्थिक सलाहकार वी. अनंत नागेश्वरन की ओर से तैयार किये गये आर्थिक सर्वेक्षण में केंद्र सरकार ने विकास और वित्तीय अनुशासन में संतुलन बनाये रखा है। चरणबद्ध राजकोषीय रणनीति के माध्यम से अर्थव्यवस्था की बुनियाद मजबूत की गयी है जिसमें पूंजीगत व्यय को प्राथमिकता दी गयी है और ऋण तथा घाटों को कम किया गया है।
वित्त वर्ष 2020-21 में राजकोषीय घाटा जीडीपी के 9.2 प्रतिशत पर पहुंच गया था जो 2024-25 में घटकर 4.8 प्रतिशत रह गया। चालू वित्त वर्ष में इसे 4.5 प्रतिशत पर रखने का लक्ष्य है। औसत राजस्व प्राप्ति कोरोना काल के पहले के पांच साल में जीडीपी के 8.5 प्रतिशत पर थी जो अगले चार साल में बढ़कर 9.1 प्रतिशत पर पहुंच गयी है। इसमें सकल कर संग्रह का मुख्य योगदान रहा है जिसका औसत 10.8 प्रतिशत से बढ़कर 11.5 प्रतिशत पर पहुंच गया।
सर्वेक्षण में कहा गया है कि राज्य सरकारों ने भी हाल के वर्षों में पूंजीगत व्यय और अपने राजस्व सृजन में प्रगति की है, लेकिन राज्य सरकारों के ऋण और घाटों के हालिया रूख चिंता उत्पन्न करते हैं। इसमें कहा गया है कि केंद्र और राज्यों के राजकोषीय संबंधों को आकार देने में 16वें वित्त आयोग की सिफारिशों की अहम भूमिका होगी। वहीं कुछ राज्यों की बिना शर्त नकद हस्तांतरण पर निर्भरता से उनका वित्तीय अनुशासन कमजोर हुआ है। इन हस्तांतरणों के माध्यम से वितरण संबंधी लक्ष्य प्राप्त होते हैं लेकिन उनके पैमाने और डिजाइन में संतुलन की जरूरत है।
आंकड़ों के हवाला देते हुए कहा गया है कि महामारी के समय राज्यों का औसत राजकोषीय घाटा 3.9 प्रतिशत पर पहुंच गया था। इसके बाद यह घटकर कोरोना से पहले के स्तर पर आया था, लेकिन पिछले तीन वित्त वर्ष में बढ़ता हुआ 3.2 प्रतिशत पर पहुंच गया है। श्री नागेश्वरन का कहना है कि राज्यों की वित्तीय अनुशासनहीनता का असर केंद्र पर भी पड़ता है और देश के लिए ऋण की लागत बढ़ती है।
आर्थिक सर्वेक्षण में कहा गया है कि जीएसटी दरों में हालिया बदलाव से मांग को समर्थन मिलने की उम्मीद है। चूंकि कम दरों से उपभोग की मात्रा बढ़ने और अनुपालन मजबूत होने की संभावना है, इसलिए मात्रा-आधारित प्रभाव राजस्व पर दर कटौती के प्रभाव की भरपाई कर सकते हैं। परिणामस्वरूप, आने वाली तिमाहियों में जीएसटी संग्रह के सुदृढ़ बने रहने की उम्मीद है।
इसमें कहा गया है कि छोटी कारों, दुपहिया वाहनों और कल-पुर्जों पर जीएसटी में कमी से मांग बढ़ने और देश के वाहन विनिर्माण आधार में मजबूती की उम्मीद है। चुनिंदा जीवन-रक्षक दवाओं पर जीएसटी को शून्य प्रतिशत और चिकित्सा उपकरणों पर पांच प्रतिशत करने से स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच बेहतर होने के साथ-साथ घरेलू उत्पादन को प्रोत्साहन मिलने की संभावना है। इसी तरह, खिलौनों, हस्तशिल्प और मानव-निर्मित रेशों पर पांच प्रतिशत जीएसटी दर लागू करने से श्रम-प्रधान एमएसएमई को समर्थन और निर्यात क्षमता का विस्तार होने की उम्मीद है।
मुख्य आर्थिक सलाहकार का मानना है कि 'विकसित भारत 2047' के दृष्टिकोण के अनुरूप, जीएसटी 2.0 वैश्विक विनिर्माण और निवेश गंतव्य के रूप में देश की स्थिति को मजबूत करता है। जीएसटी सुधारों ने वस्त्र और उर्वरक जैसे प्रमुख श्रम-प्रधान और कृषि-इनपुट क्षेत्रों में उल्टी शुल्क संरचना को पहले ही दुरुस्त कर दिया है, जिससे इन क्षेत्रों में लागत और कार्यशील पूंजी पर दबाव कम हुआ है।
हिंदी हिन्दुस्तान की स्वीकृति से एचटीडीएस कॉन्टेंट सर्विसेज़ द्वारा प्रकाशित