विद्या शंकर रायलखनऊ , जनवरी 2 -- उत्तर प्रदेश में ब्राह्मण विधायकों की बैठक के बाद हो रही राजनीति को लेकर चल रही खींचतान के बीच संगठन और सरकार के आंकड़े यह संकेत देते हैं कि पार्टी और सरकार के भीतर ब्राह्मणों की स्थिति अब भी उतनी मज़बूत नहीं है जितनी होनी चाहिए। यह दावा हालाकि संगठन में मौजूद कुछ पदाधिकारियों और सांसदों का है। इनकी मानें तो सरकार और संगठन में ब्राह्मणों को व्यवस्थित रूप से हाशिये पर धकेला गया है।
प्रदेश में पार्टी के एक मौजूदा सांसद ने यूनीवार्ता से कहा, " भाजपा के संगठनात्मक ढांचे में ओबीसी वर्ग का स्पष्ट वर्चस्व नजर आता है। प्रदेश इकाई में 12 ओबीसी नेता प्रमुख पदों पर हैं, जिनमें प्रदेश अध्यक्ष पंकज चौधरी और संगठन महामंत्री धर्मपाल सिंह शामिल हैं। प्रदेश अध्यक्ष और संगठन महामंत्री दोनों का ओबीसी होना इस वर्चस्व को केवल संख्यात्मक नहीं बल्कि संस्थागत मजबूती भी देता है।"संगठन के एक प्रदेश पदाधिकारी ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि, " योगी मंत्रिमंडल में ओबीसी वर्ग के 20 मंत्री हैं, जो कुल संख्या का लगभग 37 प्रतिशत है। राज्य में ओबीसी आबादी को देखते हुए इसे महत्वपूर्ण प्रतिनिधित्व माना जा रहा है, वहीं उत्तर प्रदेश में ब्राह्मणों की कुल आबादी लगभग 12 से 14 फ़ीसदी के आसपास हैं लेकिन उस हिसाब से न तो संगठन में और न ही सरकार में उचित स्थान दिया गया है।"प्रदेश पदाधिकारी का कहना है कि ब्राह्मण 1990 के दशक की शुरुआत से ही खासतौर पर राम मंदिर आंदोलन के बाद भाजपा की राजनीतिक संरचना और प्रतीकात्मक राजनीति का अहम हिस्सा रहे हैं। ब्राह्मणों को जिस तरह से राजनीति का शिकार बनाया जा रहा है उससे अगले विधानसभा चुनाव में पार्टी को नुक़सान उठाना पड़ सकता है।
हाल ही में यह मुद्दा तब फिर सुर्खियों में आया जब भाजपा के ब्राह्मण विधायक पीएन पाठक द्वारा बुलाई गई एक बैठक में करीब चार दर्जन ब्राह्मण विधायकों ने हिस्सा लिया। इस बैठक की नव-नियुक्त प्रदेश अध्यक्ष पंकज चौधरी ने सार्वजनिक रूप से आलोचना की।
पार्टी सूत्रों के अनुसार, यह बैठक ब्राह्मण नेताओं की अपने हिस्सेदारी को लेकर बढ़ती चिंता को दर्शाती है, खासकर ऐसे समय में जब ठाकुर और ओबीसी वर्ग के कुछ नेताओं द्वारा भी जाति-आधारित बैठकों का आयोजन किया गया है।
आंकड़ों के मुताबिक उत्तर प्रदेश भाजपा के 45 प्रमुख संगठनात्मक पदाधिकारियों में से सात ठाकुर समुदाय से हैं, जो कुल संख्या का लगभग 15 प्रतिशत है। योगी मंत्रिमंडल में भी ठाकुर और ब्राह्मणों की संख्या लगभग बराबर है। 54 मंत्रियों में से सात ठाकुर समुदाय से आते हैं। संख्यात्मक रूप से ठाकुर न तो संगठन में और न ही मंत्रिमंडल में ब्राह्मणों से अधिक हैं।
राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि ब्राह्मण और ठाकुरों के बीच यह लगभग समान प्रतिनिधित्व भाजपा की सोची-समझी रणनीति का हिस्सा है, ताकि दोनों अगड़ी जातियों के बीच किसी तरह की नाराजगी न पनपे। इससे पार्टी के भीतर शक्ति संतुलन बना रहता है और कोई भी समुदाय खुद को उपेक्षित नहीं मान सकता। अन्य ऊँची जातियों में वैश्य समुदाय के सात संगठनात्मक पदाधिकारी हैं, जबकि भूमिहार समुदाय के दो प्रतिनिधि हैं। मंत्रिमंडल में वैश्य समुदाय के पांच और भूमिहार समुदाय के दो मंत्री शामिल हैं। दलित समुदाय के आठ नेता भाजपा संगठन में प्रमुख भूमिका में हैं, जो लगभग 18 प्रतिशत प्रतिनिधित्व दर्शाता है।हालांकि यह राज्य की लगभग 20 प्रतिशत अनुसूचित जाति आबादी के लिहाज से थोड़ा कम है। मंत्रिपरिषद में दलित समुदाय के सात मंत्री हैं, जो कुल मंत्रियों का करीब 13 प्रतिशत हैं।
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