रांची, जनवरी 10 -- झारखण्ड सरकार के उच्च एवं तकनीकी शिक्षा मंत्री सुदिव्य कुमार ने विनोबा भावे विश्वविद्यालय, हजारीबाग स्थित स्वामी विवेकानंद सभागार में आयोजित प्रथम दिशोम गुरु शिबू सोरेन व्याख्यान को संबोधित किया।

श्री कुमार ने कहा कि शिक्षा केवल डिग्री अर्जन का माध्यम नहीं, बल्कि सामाजिक चेतना, आलोचनात्मक सोच और मानवीय मूल्यों के निर्माण की आधारशिला है। उन्होंने कहा कि अध्ययन और अधिगम एक-दूसरे के पूरक हैं जहाँ अध्ययन सिद्धांत प्रस्तुत करता है, वहीं अधिगम उन सिद्धांतों से उत्पन्न समझ और प्रज्ञा को विकसित करता है।

श्री कुमार ने दिशोम गुरु शिबू सोरेन के जीवन और विचारों को स्मरण करते हुए कहा कि औपचारिक रूप से सीमित शिक्षा प्राप्त होने के बावजूद उनके व्यक्तित्व, संघर्ष और विचारधारा ने उन्हें झारखण्ड राज्य का निर्माता बनाया। यह तथ्य स्वयं में शिक्षा के व्यापक अर्थ और जीवन-आधारित अधिगम की शक्ति को रेखांकित करता है। उन्होंने कहा कि आने वाले समय में दिशोम गुरु का जीवन विश्वविद्यालयों में शोध और अध्ययन का एक महत्वपूर्ण विषय बनेगा।

श्री कुमार ने समकालीन शिक्षा परिदृश्य पर प्रकाश डालते हुए कहा कि डिजिटल माध्यमों और कृत्रिम बुद्धिमत्ता से त्वरित जानकारी उपलब्ध होना उपयोगी है, किंतु इससे गहन अध्ययन और सत्यापन की प्रक्रिया कमजोर नहीं होनी चाहिए। उन्होंने पुस्तकालयों, संदर्भ ग्रंथों और कक्षा में प्रश्नोत्तर की परंपरा को सुदृढ़ करने पर बल देते हुए कहा कि छात्रों को यह पूछने की आदत विकसित करनी चाहिए कि पढ़ाए जा रहे सिद्धांतों का स्रोत और प्रमाण क्या है।

श्री कुमार ने ने भारतीय ज्ञान परंपरा का उल्लेख करते हुए कहा कि वैदिक काल से ज्ञान का प्रवाह सतत और समृद्ध रहा है। अगस्त मुनि की परंपरा का उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि भारतीय शिक्षा व्यवस्था का लक्ष्य केवल सूचना देना नहीं, बल्कि विवेक और प्रज्ञा का विकास करना रहा है। उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि ऐसे व्याख्यानों के माध्यम से विश्वविद्यालयों में अकादमिक संवाद और बौद्धिक विमर्श को नई दिशा मिलेगी।

कार्यक्रम में विश्वविद्यालय के कुलपति, प्राध्यापकगण, शिक्षाविद्, शोधार्थी, छात्र-छात्राएँ एवं विभिन्न सामाजिक क्षेत्रों के प्रतिनिधि उपस्थित थे।

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