बीजापुर , दिसंबर 03 -- छत्तीसगढ के बस्तर संभाग के आदिवासी बहुल जिले बीजापुर में आदिवासियों की पैतृक जमीनों को लेकर गंभीर अनियमितताओं का मामला सामने आया है। संविधान की पांचवीं अनुसूची और पेसा कानून लागू होने के बावजूद गैर-आदिवासियों द्वारा सुनियोजित तरीके से जमीन हड़पने के आरोप लग रहे हैं।

इसी मुद्दे को लेकर बुधवार को बीजापुर में आयोजित प्रेस वार्ता में विधायक विक्रम मंडावी ने राज्य सरकार और प्रशासन पर तीखा हमला किया। विधायक मंडावी ने कहा कि आदिवासियों के नाम दर्ज जमीनों को धोखे, कूटरचित कागजात और प्रशासनिक मिलीभगत के दम पर गैर-आदिवासियों के नाम किया जा रहा है। यह केवल जमीन का विवाद नहीं, बल्कि आदिवासी अस्मिता और अस्तित्व पर सीधा हमला है। उन्होंने बताया कि तहसील उसूर के ग्राम संकनपल्ली में लगभग 41 हेक्टेयर से अधिक कृषि भूमि, जो पीढ़ियों से आदिवासी परिवारों के नाम दर्ज है, उसे पहले एक गैर-आदिवासी रामसिंग यादव के नाम किया गया और फिर उसने इस जमीन को जगदलपुर निवासी कमलदेव झा तथा अन्य दो लोगों को बेच दिया।

श्री मंडावी ने आरोप लगाया कि इस पूरे लेन-देन की जानकारी न ग्रामसभा को दी गई, न पंचायत को। ग्राम संकनपल्ली के ग्रामीणों ने उन्हें बताया कि जिन खसरा नंबरों की जमीन बेची गई, वे पूरी तरह आदिवासी परिवारों के नाम दर्ज हैं। इसके बावजूद तहसीलदार उसूर ने बिना किसी वैध प्रक्रिया और जांच के रजिस्ट्रियां कर दीं, जबकि कानून स्पष्ट रूप से गैर-आदिवासियों को अनुसूचित क्षेत्र में भूमि खरीदने से रोकता है।

उन्होंने कई गंभीर सवाल उठाए- आखिर गैर-आदिवासी कमलदेव झा इतनी बड़ी आदिवासी जमीन का मालिक कैसे बन गया। एक साथ कई खसरा नंबरों की जमीन का नामांतरण इतनी जल्दी कैसे हुआ? तहसीलदार, उप-पंजीयक और पटवारी ने बिना ग्रामसभा की अनुमति के दस्तावेज कैसे तैयार कर दिए? अब खरीदार क्यों पटवारी पर जमीन ऑनलाइन दर्ज करने का दबाव बना रहे हैं?विधायक मंडावी ने मांग की कि इस पूरे प्रकरण की उच्चस्तरीय न्यायिक जांच हो, दोषी अधिकारियों और भूमाफियाओं पर तत्काल एफआईआर दर्ज की जाए और सभी अवैध रजिस्ट्रियों को निरस्त करते हुए जमीनें आदिवासियों को वापस की जाएं। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि समय रहते न्याय नहीं मिला तो यह मामला बड़े जनआंदोलन का रूप ले सकता है।

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