उमियम , नवंबर 12 -- मेघालय में ग्रामीण आजीविका को मज़बूत करने और वैज्ञानिक मुर्गी पालन को बढ़ावा देने के उद्देश्य से भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) ने री भोई ज़िले के नोंगस्पुंग ए गांव को पूर्वोत्तर भारत के पहले 'मॉडल पोल्ट्री क्लस्टर विलेज' के रूप में गोद लिया है।
राज्य के उमियम स्थित भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद-पूर्वोत्तर पर्वतीय क्षेत्र (आईसीएआर-एनईएच) के मुख्यालय में संस्थान और नोंगस्पुंग ए गांव के पारंपरिक सभा (दोरबार) के बीच मंगलवार को एक समझौता ज्ञापन (एमओयू) पर हस्ताक्षर किये गये।
री भोई ज़िले के उत्तरी बाहरी इलाके में बसा नोंगस्पुंग ए एक छोटा सा गांव है, जो 1972 में राज्य के गठन के बाद से ही विकास के हाशिये पर रहा है। दशकों से, यह गांव बुनियादी ढांचे और स्थायी आजीविका के स्रोतों की कमी से जूझता रहा है।
अब स्थिति हालांकि बदल रही है। एक सक्रिय ग्राम परिषद के नेतृत्व में और स्थानीय संस्थानों और सरकारी एजेंसियों के समर्थन से नोंगस्पुंग ए को एक आदर्श गांव में बदलने की महत्वाकांक्षी यात्रा शुरू हुई है।
इस पहल के तहत, आईसीएआर-एनईएच गांव के किसानों को वैज्ञानिक प्रशिक्षण, मुर्गियों की उन्नत नस्लें, चारा प्रबंधन सहायता, टीकाकरण, रोग नियंत्रण उपाय आदि प्रदान करेगा। इस परियोजना का उद्देश्य आय सृजन और पोषण सुरक्षा के लिए एक स्थायी मॉडल तैयार करना है, जिसे मेघालय के अन्य गांवों में भी दोहराया जा सके।आईसीएआर-एनईएच के निदेशक डॉ समरेंद्र हजारिका ने हस्ताक्षर समारोह में कहा कि यह परियोजना आधुनिक पोल्ट्री उत्पादन प्रणालियों को स्थानीय संसाधनों और पारंपरिक ज्ञान के साथ एकीकृत करेगी, जिससे हर स्तर पर सामुदायिक भागीदारी सुनिश्चित होगी।
डॉ. हजारिका ने नोंगस्पुंग ए गांव के प्रतिनिधियों से आईसीएआर की पहल को ग्रामीण मेघालय के लिए एक सफल रोल मॉडल बनाने के लिए कड़ी मेहनत करने का भी आग्रह किया। यह पहल पूर्वोत्तर भारत के पहाड़ी और सीमावर्ती क्षेत्रों में ग्रामीण उद्यमिता को बढ़ावा देने और आजीविका संबंधी लचीलापन बढ़ाने के आईसीएआर के व्यापक मिशन का हिस्सा है।
नोंगस्पुंग ए के प्रतिनिधियों ने आशा व्यक्त की कि यह सहयोग स्थानीय युवाओं और महिलाओं के लिए रोज़गार और आत्मनिर्भरता के नये रास्ते खोलेगा।
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