वाराणसी , नवंबर 17 -- अमेरिका के फ्लोरिडा से सोमवार को काशी के महमूरगंज स्थित एक निजी अस्पताल में इन विट्रो फर्टिलाइजेशन (आईवीएफ) लैब के निदेशक डॉ. भूषण गंगराडे पहुंचे। उन्होंने आईवीएफ तकनीक से जुड़ी कई महत्वपूर्ण जानकारियां साझा कीं।
डॉ. गंगराडे ने कहा कि पहले बांझपन को महिलाओं के लिए अभिशाप माना जाता था, लेकिन 1978 में पहली आईवीएफ बेबी के जन्म के बाद विज्ञान ने इस अभिशाप को लगभग खत्म कर दिया है। दुनिया भर में अब तक आईवीएफ की मदद से दस लाख से अधिक बच्चे पैदा हो चुके हैं।
उन्होंने बताया कि उनकी पूरी पढ़ाई-लिखाई काशी हिंदू विश्वविद्यालय ( बीएचयू ) से हुई है। बाद में फेलोशिप मिलने पर वे अमेरिका चले गए और वहीं 1990 में आईवीएफ की ट्रेनिंग ली। विज्ञान के प्रति जिज्ञासा और अवसरों के कारण वहीं सेटल हो गए, लेकिन काशी से आज भी गहरा लगाव है।
डॉ. गंगराडे ने स्पष्ट किया कि बांझपन के लिए अक्सर केवल महिलाओं को जिम्मेदार ठहराया जाता है, जबकि इसका कारण पुरुष में, महिला में या दोनों में कोई शारीरिक कमी हो सकती है। अमेरिका में तो आईवीएफ कारगर साबित हो रहा है, बशर्ते सही जानकारी और नैतिक उपयोग हो।
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