वाराणसी , फरवरी 04 -- भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) काशी हिंदू विश्वविद्यालय (बीएचयू) के वैज्ञानिकों ने जटिल लौह अयस्कों से धातु निकालने की एक नई एवं स्वच्छ तकनीक विकसित की है, जिसे पेटेंट भी प्राप्त हो चुका है। यह तकनीक पारंपरिक विधियों की तुलना में कहीं कम प्रदूषण पैदा करती है और लौह एवं इस्पात उद्योग से होने वाले कार्बन उत्सर्जन को काफी हद तक कम करने की क्षमता रखती है।

यह शोध आईआईटी बीएचयू के धातुकर्म अभियांत्रिकी विभाग के प्रो. गिरिजा शंकर महोबिया के नेतृत्व में डॉ. बिस्वजीत मिश्रा और डॉ. लक्कोजू शंकर राव के सहयोग से किया गया।

प्रो. महोबिया ने बताया कि यह कार्य एक पीएचडी शोध के रूप में शुरू हुआ था, जो धीरे-धीरे एक व्यावहारिक एवं उपयोगी तकनीक के रूप में विकसित हुआ। उन्होंने कहा कि उनका उद्देश्य स्वच्छ धातु का उत्पादन करना, मूल्यवान तत्वों की हानि को रोकना तथा पर्यावरणीय क्षति को न्यूनतम करना था।

उन्होंने अधिक जानकारी देते हुए कहा कि इस्पात का उपयोग भवनों, पुलों, रेलवे, वाहनों, मशीनरी तथा घरेलू उत्पादों में व्यापक रूप से किया जाता है।

हालांकि, पारंपरिक इस्पात निर्माण प्रक्रिया अत्यधिक ऊर्जा-खपत वाली होती है और वैश्विक कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन में लगभग 7-8 प्रतिशत का योगदान देती है। कोयला-आधारित प्रक्रियाओं से प्रति टन इस्पात उत्पादन पर करीब 2 टन कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जित होती है।

एक और बड़ी चुनौती भारत में उच्च-ग्रेड लौह अयस्कों की घटती उपलब्धता है। वर्तमान में उपलब्ध अयस्कों में लौह की मात्रा कम तथा अशुद्धियाँ अधिक होती हैं। इनमें निकेल और क्रोमियम जैसे उपयोगी धातु तत्व भी मौजूद होते हैं, लेकिन पारंपरिक तकनीकों से इन्हें प्रभावी ढंग से निकालना कठिन होता है।

यह नई तकनीक इन सभी चुनौतियों का समाधान प्रस्तुत करती है। प्रो. महोबिया ने बताया कि इस प्रक्रिया में कोयला या कोक का बिल्कुल भी उपयोग नहीं किया जाता। इसके स्थान पर हाइड्रोजन गैस का प्रयोग किया जाता है। हाइड्रोजन धातु में अशुद्धियाँ डाले बिना लौह का निष्कर्षण करती है और ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन को लगभग शून्य तक ले आती है।

इस प्रक्रिया में पहले लौह अयस्क के सूक्ष्म कणों को पेलेट्स (छोटे गोलाकार कण) के रूप में तैयार किया जाता है। इसके बाद इन पेलेट्स को नियंत्रित वातावरण में हाइड्रोजन गैस के संपर्क में लाया जाता है, जिससे अयस्क से ऑक्सीजन हट जाती है और स्वच्छ लौह प्राप्त होता है। आगे गर्म करने पर धातु और अपशिष्ट (स्लैग) अपने आप अलग हो जाते हैं तथा छोटे-छोटे शुद्ध धातु के नगेट्स बनते हैं।

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