वाराणसी , अप्रैल 6 -- भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी), काशी हिंदू विश्वविद्यालय (बीएचयू) के जैव रासायनिक अभियांत्रिकी विभाग के शोधकर्ताओं ने अपशिष्ट जल से कैडमियम एवं सीसा जैसी विषैली भारी धातुओं को हटाने के लिए एक अभिनव एवं पर्यावरण-अनुकूल तकनीक विकसित की है।

यह शोध कार्य एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. विशाल मिश्रा के नेतृत्व में उनके पीएच.डी. शोधार्थी डॉ. वीर सिंह के साथ मिलकर किया गया। यह तकनीक मशरूम बायोमास आधारित अवशोषण पर आधारित है, जो पर्यावरण और जनस्वास्थ्य से जुड़ी एक गंभीर चुनौती का समाधान प्रस्तुत करती है।

इस शोध कार्य में इलाहाबाद विश्वविद्यालय के प्रो. मोहन पी. सिंह एवं डॉ. निधि सिंह तथा आईआईटी (बीएचयू) की प्रो. आभा मिश्रा ने भी सहयोग प्रदान किया। शोध दल ने सभी सहयोगियों के प्रति आभार व्यक्त किया है। अपने पूर्व शोध को आगे बढ़ाते हुए टीम ने इस नवीन तकनीक को विकसित किया और इसके लिए पेटेंट का आवेदन कर दिया है। यह पेटेंटे नवाचार एक कार्यात्मक फंगल बायोमास-आधारित अवशोषक प्रस्तुत करता है, जो जल शोधन के लिए प्रभावी, कम लागत वाला और पर्यावरण-अनुकूल विकल्प उपलब्ध कराता है।

इस तकनीक में मशरूम प्रजातियों से प्राप्त फंगल बायोमास का उपयोग किया गया है। अवशोषण क्षमता बढ़ाने के लिए बायोपॉलिमर का समावेशन भी किया गया है। यह जैविक समाधान एक साथ कई भारी धातुओं-विशेष रूप से कैडमियम और सीसा-को हटाने में सक्षम है। यह कम लागत वाला, प्राकृतिक और स्केलेबल समाधान प्रदूषित जल उपचार के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण पहल है, जो वैश्विक जल संकट से निपटने में सहायक सिद्ध हो सकता है।

जल प्रदूषण आज विश्व स्तर पर एक गंभीर समस्या बन चुका है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, जल जनित बीमारियों के कारण प्रतिवर्ष लगभग 34 लाख लोगों की मृत्यु होती है। वहीं यूनिसेफ के अनुसार, प्रतिदिन लगभग 4000 बच्चों की मृत्यु दूषित जल के सेवन से होती है।

सरकारी आंकड़ों के अनुसार, 153 जिलों में 23.9 करोड़ से अधिक लोग ऐसे जल का उपयोग कर रहे हैं जिसमें क्रोमियम, सीसा, कैडमियम और आर्सेनिक जैसी विषैली धातुओं की मात्रा निर्धारित सीमा से अधिक है। इन तत्वों के दीर्घकालिक संपर्क से कैंसर सहित कई गंभीर बीमारियां हो सकती हैं।

डॉ. विशाल मिश्रा ने बताया कि यह तकनीक विशेष रूप से विकासशील क्षेत्रों के लिए अत्यंत उपयोगी सिद्ध हो सकती है, जहां स्वच्छ जल और उन्नत जल शोधन सुविधाएं सीमित हैं। इस तकनीक के प्रमुख लाभ हैं-कम लागत, गैर-विषाक्त एवं पर्यावरण-अनुकूल प्रकृति, महंगे उपकरणों या रसायनों की अनुपस्थिति, संचालन में सरलता तथा न्यूनतम ऊर्जा की आवश्यकता।

इस उपलब्धि पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए आईआईटी (बीएचयू) के निदेशक प्रो. अमित पात्र ने कहा कि यह नवाचार संस्थान की उस प्रतिबद्धता को दर्शाता है, जिसमें वैश्विक चुनौतियों का समाधान सतत और प्रभावशाली वैज्ञानिक अनुसंधान के माध्यम से किया जा रहा है।

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