पटना , अक्टूबर 28 -- दलितों के करिश्माई नेता राम विलास पासवान ने पुलिस उपाधीक्षक (डीएसपी) की नौकरी छोड़ कर वर्ष 1969 में खगड़िया जिले की अलौली (सुरक्षित) सीट से अपनी सियासी पारी की शुरूआत की और सफलता के शिखर पर पहुंचे और अब इसी सीट से उनके भतीजा यशराज पासवानभी अपनी राजनीतिक पारी की शुरूआत कर रहे हैं।
'गूंजे धरती आसमान, रामविलास पासवान' जैसे नारों के बीच हाजीपुर लोकसभा सीट से वर्ष 1977 में अपनी शानदार संसदीय पारी की शुरूआत कर विश्व रिकार्ड बनाने वाले और आठ बार इस सीट से जीत हासिल करने वाले राम विलास पासवान वर्ष 1969 में डीएसपी बने थे। पुलिस की नौकरी में मन नही लगा तो उन्होने राजनीति में आने का बड़ा फैसला कर लिया। राम विलास पासवान ने पहली बार वर्ष 1969 में संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी के टिकट पर अलौली सुरक्षित विधानसभा सीट से चुनाव जीता और यहीं से उनके राजनीतिक जीवन की दिशा निर्धारित हो गई। राम विलास पासवान के पिता नहीं चाहते थे कि वे राजनीति में अपना भविष्य आगे देखें। वह चाहते थे यदि राम विलास राजनीति में ही आना चाहते हैं तो छोटी-मोटी पार्टी से नहीं बल्कि कांग्रेस से चुनाव लड़े। पासवान के पिता ने उन्हें पुलिस की नौकरी में जाने के लिए कह दिया था, हालांकि पासवान ने अपने पिता की मर्जी के खिलाफ राजनीति में ही आगे जाने का फैसला किया था। वर्ष 2016 में राम विलास पासवान ने अपने ट्विटर हैंडल से अपने जीवन की एक अनोखी घटना शेयर की थी, जब वह डीएसपी की परीक्षा में पास हुए उसी समय वह विधायक भी बन गए थे। तब उनके एक दोस्त ने उनसे पूछा था,' गवर्नमेंट बनना चाहते हो या फिर सर्वेंट!' इसके बाद पासवान राजनीति में आ गये।
उन दिनों राम विलास पासवान अपने दो-तीन साथियों के साथ ट्रेन में जा रहे थे। अलौली विधानसभा के विधायक रहे मिश्री सदा भी ट्रेन में बैठे हुए थे। पासवान ने उन्हें नमस्कार कहा और अपनी सीट पर बैठ गए। राम विलास पासवान उस समय बड़ा नाम नहीं थे, इसलिए किसी ने उन्हें पहचाना भी नहीं। मिश्री सदा अपने समर्थकों के साथ बातचीत कर रहे थे। पासवान भी उनकी बातें सुन रहे थे। एक कांग्रेसी कार्यकर्ता मिश्री सदा को बता रहा था, इस बार अलौली से संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी से किसी पासवान नाम के लड़के को टिकट देने का फैसला किया है। हाल ही में डीएसपी बना है, कल का लौंडा है और आपको चुनौती दे रहा है।' मिश्री सदा ने इस पर हंसते हुए समर्थक से कहा था, 'चलो पिछली बार 40 हजार वोट से जीते थे और इस बार 80 हजार वोट से जीत जाएंगे।' राम विलास पासवान को ये व्यंग्य बहुत बुरा लगा।वह हर हाल में अलौली विधानसभा से चुनाव लड़कर मिश्री सदा को इसका जवाब देना चाहते थे। उन्होंने संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी से टिकट मिलने के बाद गांव-गांव साइकिल से प्रचार शुरू किया। लगातार विधायक चुनते आ रहे मिश्री सदा को राम विलास पासवान ने करीब 906 वोटों के अंतर से शिकस्त दी थी। श्री पासवान के बाद उनके अनुज पशुपति कुमार पारस ने अलौली सीट से वर्ष 1977,1985, 1990, 1995, 2000, फरवरी 2005,अक्टूबर 2005 के चुनाव में भी जीत हासिल की। हालांकि वर्ष 2010 और वर्ष 2015 में उन्हें इस सीट पर हार का सामना करना पड़ा। वर्ष 2020 के चुनाव में भी पासवान के परिवार का कोई सदस्य यहां नहीं निर्वाचित हुआ।बिहार की सियासत के बेताज बादशाह कहे जाने वाले दलित नेता रामविलास पासवान को देश के छह प्रधानमंत्रियों के साथ काम करने का मौका भी मिला। विश्वनाथ प्रताप सिंह, एचडी देवेगौड़ा, इंद्र कुमार गुजराल, अटल बिहारी वाजपेयी, डॉ मनमोहन सिंह और नरेंद्र मोदी सरकार में राम विलास पासवान मंत्री रहे। वह दो बार राज्यसभा सांसद भी बने।
वर्ष 1977 में राम विलास पासवान ने हाजीपुर से अपने संसदीय जीवन की शुरूआत की और यहां कांग्रेस के किले को गिरा दिया।हाजीपुर के लोगों ने उन्हें रिकार्ड मतों से चुनाव जिताया था। इस चुनाव के बाद उनका नाम गिनीज बुक आफ द वर्ल्ड रिकार्ड में दर्ज हो गया। उन्हें 89.3 प्रतिशत वोट मिला था। उनके निकटतम प्रतिद्वंद्वी को मात्र 8.47 प्रतिशत वोट से ही संतोष करना पड़ा था।
खगड़िया जिले की अलौली सुरक्षित सीट पर 06 नवंबर को चुनाव होना है। इस सीट पर पूर्व केन्द्रीय मंत्री पशुपति कुमार पारस के पुत्र यशराज पासवान अपनी सिपासी पारी का आगाज कर रहे हैं। देखना दिलचस्प होगा कि वह अपने परिवार की परंपरागत सीट को अपने कब्जे में वापस पाने में कितना सफल हो पाते हैं।
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