नयी दिल्ली , फरवरी 25 -- राष्ट्रीय जनता दल के सांसद सुधाकर सिंह ने कहा है कि भारत और अमेरिका के बीच प्रस्तावित अंतरिम व्यापार समझौता से पहले से ही आर्थिक दबाव और गरीबी का सामना कर रहे भारतीय किसान, दुग्ध उत्पादक तथा मंडियों में अनाज एवं फलों का व्यवसाय करने वाले छोटे आढ़ती गंभीर रूप से प्रभावित होंगे।

बक्सर से लोकसभा सांसद श्री सुधाकर सिंह ने अमेरिका के साथ अंतरिम व्यापार समझौते को लेकर बुधवार को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को एक पत्र लिखकर गंभीर चिंता व्यक्त की। उन्होंने कहा कि भारत और अमेरिका के बीच प्रस्तावित अंतरिम व्यापार समझौते से संबंधित जो तथ्य सार्वजनिक रूप से सामने आए हैं, वे विशेष रूप से भारत के कृषि क्षेत्र, किसानों तथा छोटे कृषि आढ़तियों के लिए अत्यंत चिंताजनक प्रतीत होते हैं।

उन्होंने कहा कि भारत और अमेरिका के बीच द्विपक्षीय वार्ता के पश्चात अमेरिका के राष्ट्रपति द्वारा यह घोषित किया गया है कि इस समझौते के अंतर्गत अमेरिकी उत्पादों, विशेषकर अमेरिकी कृषि उत्पादों, पर भारत में आयात शुल्क को न्यूनतम किया जाएगा तथा अनेक उत्पादों पर शून्य प्रतिशत आयात शुल्क लागू किया जाएगा। कृषि व्यवसाय के विशेषज्ञों के अनुसार इस संभावित समझौते में अमेरिका के विभिन्न कृषि एवं खाद्य उत्पाद जैसे सूखे अनाज, लाल ज्वार, मक्का, सोयाबीन, मूंगफली, मेवों में अखरोट, बादाम, पिस्ता, फलों में सेब, अंगूर, नारंगी, डेयरी उत्पादों में चीज़, मक्खन, क्रीम, डीहाइड्रेटेड मिल्क पाउडर, तथा मांसाहारी श्रेणी में पोल्ट्री उत्पाद जैसे मुर्गे का मांस और अंडे शामिल किए जाने की संभावना व्यक्त की जा रही है। इसके अतिरिक्त यह भी आशंका व्यक्त की जा रही है कि कृषि उत्पादों की श्रेणी में अमेरिकी लकड़ी, कृषि अपशिष्ट (जैसे मक्का एवं सोयाबीन की भूसी) तथा पशु-चारा को भी न्यूनतम शुल्क पर भारत में निर्यात किए जाने का प्रावधान इस समझौते का एक महत्वपूर्ण हिस्सा हो सकता है।

राजद सांसद ने कहा कि यदि उपर्युक्त अमेरिकी कृषि उत्पाद भारतीय बाजार में न्यूनतम या शून्य आयात शुल्क के साथ प्रवेश करते हैं, तो इसका भारतीय कृषि बाजार पर गहरा और व्यापक प्रभाव पड़ना स्वाभाविक है। अमेरिकी कृषि क्षेत्र अपनी सरकारी प्रोत्साहन नीतियों तथा वैश्विक व्यापार संरचना के कारण अत्यंत सुदृढ़ स्थिति में है। वहाँ कृषि उत्पादन बड़े कॉरपोरेट एवं वैश्विक व्यावसायिक संस्थानों के माध्यम से संचालित होता है। साथ ही, अमेरिकी सरकार अपने किसानों को वैश्विक तुलना में अत्यधिक एवं संरचित सब्सिडी का लाभ प्रदान करती है। ऐसी परिस्थिति में छोटे भारतीय उत्पादकों एवं सीमांत किसानों के लिए प्रतिस्पर्धा करना अत्यंत कठिन होगा।

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