नयी दिल्ली , फरवरी 07 -- राष्ट्र निर्माण केवल अधिकारों की मांग से नहीं, बल्कि कर्तव्यों के सजग और ईमानदार निर्वहन से संभव है इसलिए निर्माण के लिए युवा शक्ति के इस महत्व को समझना जरूरी है। अमृत काल में यह युवा शक्ति ही राष्ट्र निर्माण की सबसे मजबूत आधारशिला है।

यह विचार केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय के आदर्श योजना प्रभारी प्रो. कुलदीप शर्मा ने यहां 17वें जनजातीय युवा आदान-प्रदान कार्यक्रम में व्यक्त किए। यह कार्यक्रम युवा कार्यक्रम एवं खेल मंत्रालय के तत्वावधान तथा गृह मंत्रालय के समन्वय से 6 से 12 फरवरी तक यहां आनंद धाम में आयोजित किया जा रहा है।

कार्यक्रम का उद्देश्य जनजातीय युवाओं को राष्ट्र की सामाजिक-सांस्कृतिक संस्थाओं, राष्ट्रीय विरासत, नेतृत्व क्षमता तथा राष्ट्र निर्माण की मूल अवधारणाओं से परिचित कराना है। इसमें देश के विभिन्न जनजातीय बहुल जिलों से आए करीब 200 जनजातीय युवा प्रतिभागियों के साथ ही सीआरपीएफ, आईटीबीपी, बीएसएफ सहित विभिन्न सुरक्षा एजेंसियों के 220 प्रतिभागी सहभागिता कर रहे हैं। इस कार्यक्रम में प्रतिभागी छत्तीसगढ़ के बस्तर, बीजापुर, कांकेर, नारायणपुर एवं मोहला-मनपुर-अम्बागढ़ चौकी, झारखंड के पश्चिम सिंहभूम, मध्य प्रदेश के बालाघाट, ओडिशा के कंधमाल व कालाहांडी तथा महाराष्ट्र के गढ़चिरौली जिलों से शामिल हुए हैं।

इस दौरान अमृत काल में राष्ट्र निर्माण एवं देशभक्ति में युवाओं की भूमिका विषय पर विशेष व्याख्यान आयोजित किया गया जिसमें प्रो. कुलदीप शर्मा ने कहा कि युवाओं को विभिन्न गतिविधियों के माध्यम से अपने मौलिक अधिकारों एवं कर्तव्यों की व्यावहारिक समझ हासिल करते हुए राष्ट्र निर्माण में अपनी निर्णायक भूमिका, नेतृत्व क्षमता, सक्रिय सहभागिता एवं दायित्वों पर फोकस करना चाहिए।

कार्यक्रम में राष्ट्रीय दृष्टिकोण, सांस्कृतिक समन्वय एवं आपसी समझ को सुदृढ़ विभिन्न राज्यों से आए युवाओं को एक साझा मंच प्रदान करते हुए निर्णय लिया गया कि आने वाले दिनों में प्रतिभागियों के लिए क्षेत्रीय भ्रमण, सांस्कृतिक आदान-प्रदान, कौशल विकास, नेतृत्व प्रशिक्षण तथा भारत की लोकतांत्रिक संस्थाओं से परिचय से संबंधित विविध गतिविधियाँ आयोजित की जाएँगी।

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